Devaki-Vasudev Ka Vivah Aur Aakashvani

देवकी-वसुदेव का विवाह और आकाशवाणी

Devaki-Vasudev Ka Vivah Aur Aakashvani

मथुरा नगरी उन दिनों वैभव और उल्लास से भरी हुई थी। यदुवंश के तेजस्वी राजकुमार वसुदेव और उग्रसेन के भाई देवक की सुशील कन्या देवकी का विवाह बड़े धूमधाम से सम्पन्न हुआ था। नगर के भवन तोरणों से सजे थे, मंगलगान गूँज रहे थे, और चारों ओर आनंद की लहर दौड़ रही थी। देवकी और वसुदेव का यह मिलन मानो धर्म और सौम्यता का संगम था, जिसे देखकर सभी सज्जन हृदय से आशीर्वाद दे रहे थे।

विवाह के पश्चात जब नवविवाहित दम्पति को विदा करने का समय आया, तो देवकी का चचेरा भाई कंस स्वयं रथ की बागडोर थामकर बहन को ससम्मान पहुँचाने चल पड़ा। कंस उस समय अपनी बहन के प्रति स्नेह प्रकट कर रहा था और उसका यह व्यवहार सबको सुखद लग रहा था। सुसज्जित रथ, बजते वाद्य और स्नेह से भरा वातावरण — सब कुछ शुभ प्रतीत हो रहा था। किन्तु विधाता ने उसी क्षण के लिए एक ऐसी घटना नियत कर रखी थी जो इतिहास की धारा को मोड़ देने वाली थी।

रथ अभी थोड़ी ही दूर बढ़ा था कि सहसा आकाश गूँज उठा। एक गम्भीर, अशरीरी आकाशवाणी हुई — "हे कंस! जिस देवकी को तू इतने स्नेह से पहुँचा रहा है, उसी का आठवाँ पुत्र तेरे प्राणों का अंत करेगा।" यह वाणी सुनते ही कंस के हृदय में मानो बिजली गिर पड़ी। पल भर पहले का स्नेह भय और क्रोध में बदल गया। उसका मुख विवर्ण हो उठा और आँखों में आतंक झलकने लगा।

क्रोध से अंधा होकर कंस ने तुरन्त तलवार खींच ली और अपनी ही बहन देवकी के केश पकड़कर उसका वध करने को उद्यत हो गया। नवविवाहिता देवकी काँपती हुई अपने भाई की ओर करुण दृष्टि से देखने लगी। ऐसे भयंकर क्षण में धैर्यवान वसुदेव ने अपनी बुद्धि नहीं खोई। उन्होंने कोमल किन्तु दृढ़ वाणी में कंस को समझाया — "हे राजन! यह निर्दोष नारी तुम्हारी छोटी बहन के समान है। इसका वध तुम्हारे यश को कलंकित कर देगा। और सुनो, आकाशवाणी तो देवकी के पुत्रों की बात कहती है, स्वयं देवकी की नहीं।"

वसुदेव ने कंस को शांत करते हुए एक वचन दिया — "मैं तुम्हें प्रतिज्ञा देता हूँ कि देवकी से जो भी सन्तान उत्पन्न होगी, मैं उसे स्वयं तुम्हारे हाथों में सौंप दूँगा। तुम जो चाहो, वह करना।" वसुदेव जानते थे कि इस समय बहन के प्राण बचाना ही सर्वोपरि है; समय आने पर विधाता स्वयं मार्ग निकालेगा। सत्यनिष्ठ वसुदेव के इस वचन पर कंस को कुछ विश्वास हुआ और उसने तलवार नीची कर ली।

इस प्रकार देवकी के प्राण उस क्षण के लिए बच गये, किन्तु उनके जीवन में एक लम्बे परीक्षा-काल का आरम्भ हो गया। जो विवाह मंगलगान से आरम्भ हुआ था, वह अब एक गहन प्रतीक्षा में बदल चुका था — उस दिव्य शिशु की प्रतीक्षा जो आगे चलकर अधर्म का नाश करने वाला था।

यह कथा हमें यही भाव देती है कि जब अधर्म अपने चरम पर पहुँचता है, तब स्वयं परमात्मा अवतार लेने की भूमि तैयार कर देते हैं। आकाशवाणी वस्तुतः भक्तों के लिए आश्वासन थी कि अन्याय कितना भी प्रबल क्यों न हो, धर्म की विजय निश्चित है।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Kans Dwara Devaki-Vasudev Ko Karagar Mein Bandi Banana Aur Chhah Putron Ka Vadh

कंस द्वारा देवकी-वसुदेव को कारागार में बंदी बनाना और छह पुत्रों का वध

Janm aur Gokul Aagman
Balram Ka Garbh Sthanantaran (Rohini Ke Garbh Mein)

बलराम का गर्भ स्थानांतरण (रोहिणी के गर्भ में)

Janm aur Gokul Aagman
Krishna Janm — Janmashtami Ki Raat, Bediyan Khulna Aur Pahredaron Ka Sona

कृष्ण जन्म — जन्माष्टमी की रात, बेड़ियाँ खुलना और पहरेदारों का सोना

Janm aur Gokul Aagman
Vasudev Ka Yamuna Paar Karna Aur Sheshnag Ki Chhaya

वसुदेव का यमुना पार करना और शेषनाग की छाया

Janm aur Gokul Aagman
Yashoda Ke Yahan Yogmaya Ka Janm Aur Uska Kans Ke Haath Se Chhutna

यशोदा के यहाँ योगमाया का जन्म और उसका कंस के हाथ से छूटना

Janm aur Gokul Aagman