
बलराम का गर्भ स्थानांतरण (रोहिणी के गर्भ में)
Balram Ka Garbh Sthanantaran (Rohini Ke Garbh Mein)
कारागार में देवकी के छह पुत्रों के वध के पश्चात मथुरा नगरी शोक और भय के अंधकार में डूबी हुई थी। किन्तु उसी अंधकार के पीछे परमात्मा अपनी दिव्य लीला की भूमिका रच रहे थे। अब देवकी सातवें गर्भ को धारण किये हुए थीं, और यह गर्भ कोई साधारण नहीं था — यह स्वयं अनंत शेष के अंश, संकर्षण अर्थात् बलराम का था, जो श्रीकृष्ण के अग्रज बनकर उनकी लीलाओं के सहभागी होने वाले थे।
देवकी के इस दिव्य गर्भ की रक्षा करना विधाता का संकल्प था, क्योंकि कंस के कारागार में इस शिशु का जीवन सुरक्षित नहीं था। तब भगवान ने अपनी योगमाया को आदेश दिया। योगमाया प्रभु की वह अचिन्त्य शक्ति है, जो असम्भव को सम्भव कर देती है और जिसके द्वारा भगवान अपनी लीला सम्पन्न करते हैं। भगवान ने कहा — "हे देवि! तुम देवकी के इस सातवें गर्भ को वहाँ से लाकर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दो, जो इस समय गोकुल में नन्द के यहाँ सुरक्षित निवास कर रही हैं।"
योगमाया ने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य की और अपनी दिव्य शक्ति से वह गर्भ अत्यन्त कोमलता से देवकी के उदर से रोहिणी के उदर में स्थानांतरित कर दिया। यह ऐसी अलौकिक घटना थी जिसे न कारागार के पहरेदार जान सके और न कंस के गुप्तचर। जो कार्य लौकिक दृष्टि से असम्भव था, वह प्रभु की योगमाया के लिए एक क्षण का खेल था।
इधर कारागार में देवकी का गर्भ अचानक विलीन-सा हो गया, और यह समाचार शीघ्र ही नगर में फैल गया कि देवकी का गर्भपात हो गया। कंस ने भी यही समझा और थोड़ा निश्चिन्त हुआ, यह न जानते हुए कि वह दिव्य शिशु तो सुरक्षित रूप से गोकुल पहुँच चुका है। इस प्रकार कंस की चौकसी उसकी अपनी अज्ञानता से ही व्यर्थ हो गई। जो अभिमान से सोचता था कि वह सब कुछ अपने वश में किये हुए है, वह ईश्वर की माया के आगे असहाय था।
उधर गोकुल में रोहिणी को यह जानकर अपार आनंद हुआ कि वे इस दिव्य शिशु की माता बनने वाली हैं। नन्द-यशोदा के स्नेहमय आँगन में, यमुना और वृन्दावन की पावन गोद में वह गर्भ पलने लगा। क्योंकि इस शिशु को देवकी के गर्भ से आकर्षित करके — संकर्षित करके — रोहिणी के गर्भ में लाया गया था, इसीलिए इस बालक का नाम आगे चलकर "संकर्षण" पड़ा; और उनके गौरवर्ण, बल और सुन्दरता के कारण वे "बलराम" व "बलभद्र" कहलाए।
बलराम आगे चलकर श्रीकृष्ण के अनन्य साथी, रक्षक और सहचर बने। जहाँ-जहाँ कृष्ण की लीला हुई, वहाँ-वहाँ बलराम की छाया-सी उपस्थिति रही। दोनों भाइयों की जोड़ी भक्ति-जगत में प्रेम और सामर्थ्य का अनुपम प्रतीक बन गई।
इस कथा की महिमा यही है कि भगवान की योगमाया के आगे संसार की कोई शक्ति टिक नहीं सकती। जिसे प्रभु रक्षित करना चाहें, उसे कोई कंस, कोई कारागार, कोई पहरा हानि नहीं पहुँचा सकता।