
कंस द्वारा देवकी-वसुदेव को कारागार में बंदी बनाना और छह पुत्रों का वध
Kans Dwara Devaki-Vasudev Ko Karagar Mein Bandi Banana Aur Chhah Putron Ka Vadh
आकाशवाणी के उस भयंकर दिन के पश्चात कंस के मन से भय कभी न मिटा। यद्यपि वसुदेव ने अपनी सन्तान सौंपने का वचन दिया था, फिर भी कंस का संदेही और क्रूर स्वभाव उसे चैन से न रहने देता था। दुष्ट मंत्रियों की संगति और अपने आसुरी अहंकार के कारण उसका हृदय और भी कठोर होता गया। अंततः उसने निश्चय किया कि देवकी और वसुदेव को अपनी दृष्टि से बाहर नहीं जाने देगा।
कंस ने अपने ही मामा-भाई-बन्धुओं के इस दम्पति को मथुरा के कारागार में बंदी बना दिया। लोहे की बेड़ियों से बँधे, सूर्य के प्रकाश से वंचित, कठोर पहरे में देवकी और वसुदेव का जीवन कष्ट और प्रतीक्षा से भर गया। जिन राजकुमारों का जीवन वैभव में बीतना चाहिए था, वे अब अंधकारमय कोठरी में दिन गिनने लगे। किन्तु दोनों ने धैर्य और ईश्वर पर विश्वास को अपना सहारा बनाया।
समय बीतता गया और देवकी ने प्रथम पुत्र को जन्म दिया। सत्यनिष्ठ वसुदेव ने अपने वचन का पालन करते हुए वह नवजात शिशु स्वयं कंस के हाथों में ला दिया। वसुदेव की इस सच्चाई से कंस के मन में एक क्षण को उदारता जागी और उसने कहा — "मुझे तो आठवें पुत्र से भय है; इस प्रथम शिशु को तुम ले जाओ।" किन्तु दुष्ट संगति और सशंकित मन शीघ्र ही उसकी उदारता को निगल गया।
नारद मुनि ने कंस के पास आकर उसके संशय को और बढ़ा दिया, यह संकेत देते हुए कि यदुवंश में कोई भी शिशु उसके लिए संकट बन सकता है। इससे कंस पूर्णतः निर्दयी हो उठा। उसने अपना वचन तोड़कर वसुदेव के लाए हुए उस प्रथम शिशु का वध कर दिया। यह देखकर देवकी का हृदय फट पड़ा, किन्तु बंदी माता के आँसुओं के सिवा और कोई उपाय न था।
इसी क्रूर क्रम में कंस ने देवकी के छह पुत्रों का एक-एक कर वध किया। हर बार एक नन्हा शिशु जन्म लेता, हर बार माता का हृदय स्नेह से भर जाता, और हर बार वह निर्मम कंस उस मासूम को छीन लेता। देवकी और वसुदेव इस असह्य वेदना को केवल इसलिए सहते रहे कि उन्हें भरोसा था कि विधाता का कोई गूढ़ संकल्प इसके पीछे अवश्य है। पुराण-परम्परा कहती है कि वे छह शिशु पूर्वजन्म के शापित दिव्य जीव थे, जिनकी मुक्ति इसी लीला में नियत थी।
इतने कष्ट सहकर भी देवकी-वसुदेव ने न तो धर्म का त्याग किया और न ईश्वर से विमुख हुए। उनका यह अटूट विश्वास ही आगे आने वाली महान लीला की भूमि बना। अंधकार जितना गहरा होता गया, प्रभु के प्राकट्य का प्रकाश उतना ही निकट आता गया।
यह कथा भक्तों को यही महिमा सुनाती है कि जीवन के सबसे कठिन काल में भी यदि हम धैर्य और ईश्वर-विश्वास न छोड़ें, तो अंततः प्रभु स्वयं हमारे कष्टों का अंत करने के लिए प्रकट होते हैं।