
वसुदेव का यमुना पार करना और शेषनाग की छाया
Vasudev Ka Yamuna Paar Karna Aur Sheshnag Ki Chhaya
जन्माष्टमी की उस पावन मध्यरात्रि में, जब कारागार के द्वार स्वयं खुल गये और पहरेदार गहरी निद्रा में डूब गये, तब वसुदेव उस दिव्य शिशु श्रीकृष्ण को टोकरी में रखकर मथुरा से गोकुल की ओर चल पड़े। बाहर घना अंधकार था, आकाश में मेघ गरज रहे थे और मूसलधार वर्षा हो रही थी। किन्तु वसुदेव के मन में न भय था, न संशय — केवल प्रभु की आज्ञा का पालन करने की अटूट श्रद्धा थी।
चलते-चलते वसुदेव यमुना के तट पर पहुँचे। वर्षा के कारण यमुना उफान पर थी; उसकी लहरें गरजती हुई ऊँची उठ रही थीं और उस अंधकार में पार करना असम्भव-सा प्रतीत हो रहा था। एक क्षण को वसुदेव सोच में पड़े, किन्तु प्रभु पर विश्वास रखकर उन्होंने शिशु को सिर पर उठाये हुए नदी में पग रखा। जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, जल उनके घुटनों तक, फिर कमर तक और फिर गले तक चढ़ने लगा।
तभी एक अद्भुत लीला घटित हुई। कहते हैं कि उस दिव्य शिशु के चरण-स्पर्श की अभिलाषा से यमुना स्वयं उमड़ पड़ी थी; प्रभु के चरण छूते ही वह पावन माता तृप्त होकर शांत हो गई और उन्हें मार्ग देने के लिए नीचे उतर गई। जो प्रचण्ड धारा अभी असह्य लग रही थी, वह अब वसुदेव के लिए सुगम पथ बन गई। भक्त का पथ प्रभु स्वयं सुगम कर देते हैं — यह इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था।
ऊपर आकाश से मूसलधार वर्षा हो रही थी और वसुदेव के मन में केवल एक ही चिन्ता थी कि यह कोमल शिशु भीग न जाये। उसी क्षण एक और दिव्य दृश्य प्रकट हुआ — शेषनाग, जो स्वयं भगवान के नित्य सेवक और अनंत के प्रतीक हैं, प्रकट होकर वसुदेव के पीछे-पीछे चलने लगे। उन्होंने अपने विशाल सहस्र फणों को छत्र की भाँति शिशु के ऊपर तान दिया, जिससे वर्षा की एक भी बूँद उस बालक पर न पड़े।
शेषनाग की उस विशाल फण-छाया के नीचे, यमुना के उमड़ते जल के बीच से, वसुदेव अपने आराध्य को सुरक्षित लिये चलते रहे। एक ओर मेघों की गर्जना, दूसरी ओर लहरों का शोर — किन्तु उस दिव्य शिशु के मुख पर मंद स्मित बना रहा और वसुदेव के हृदय में अपार शांति। सम्पूर्ण प्रकृति उस रात प्रभु की सेवा में तत्पर थी; जल ने मार्ग दिया, नाग ने छत्र दिया, और अंधकार ने रक्षा का पर्दा बना दिया।
अंततः वसुदेव सकुशल यमुना पार कर गोकुल पहुँच गये। वहाँ भी योगमाया के प्रभाव से नन्द के घर के सब लोग गहरी निद्रा में थे। वसुदेव ने बिना किसी विघ्न के भीतर प्रवेश किया, दिव्य शिशु श्रीकृष्ण को यशोदा की शय्या पर धीरे से रख दिया, और वहाँ जन्मी उस कन्या को उठाकर पुनः कारागार की ओर लौट पड़े।
इस लीला की महिमा यही है कि जो भक्त पूर्ण श्रद्धा से प्रभु की शरण में चलता है, उसके लिए उमड़ती नदियाँ भी शांत हो जाती हैं और स्वयं शेषनाग उसकी रक्षा को खड़े हो जाते हैं। जहाँ प्रभु स्वयं साथ हों, वहाँ कोई बाधा टिक नहीं सकती।