
यज्ञ का प्रसाद और पवनदेव द्वारा अंजनी तक पहुँचाना
Yagya Ka Prasad Aur Pawandev Dwara Anjani Tak Pahunchana
उन्हीं दिनों अयोध्या में महाराज दशरथ पुत्र-प्राप्ति की कामना से व्याकुल थे। तीन-तीन रानियाँ होते हुए भी राजमहल की गोद सूनी थी और राजगद्दी का कोई उत्तराधिकारी न था। तब कुलगुरु वसिष्ठ और ऋष्यशृंग मुनि के परामर्श से महाराज दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करने का संकल्प लिया, जिससे उन्हें दिव्य संतान की प्राप्ति हो।
सरयू तट पर विशाल यज्ञशाला सजाई गई। वेदमंत्रों की ध्वनि से समस्त अयोध्या गूँज उठी। ऋष्यशृंग मुनि के निर्देशन में यज्ञ की आहुतियाँ दी जाने लगीं। जब यज्ञ पूर्ण हुआ, तो अग्निकुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ, जिसके हाथ में स्वर्ण-पात्र था। उस पात्र में देवताओं का दिया हुआ पवित्र खीर-रूपी प्रसाद भरा था। उस दिव्य पुरुष ने कहा — "राजन! यह देवताओं का प्रसाद है। इसे अपनी रानियों में बाँट दो; इससे तुम्हें तेजस्वी पुत्र प्राप्त होंगे।"
महाराज दशरथ ने वह प्रसाद अपनी रानियों — कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा — में बाँट दिया। परंतु यहीं एक अद्भुत लीला घटित हुई। कहा जाता है कि जब प्रसाद बाँटा जा रहा था, तब उस दिव्य खीर का एक अंश किसी पक्षी के द्वारा या वायु के वेग से महल के आँगन से उड़ चला। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, अपितु विधाता की रची हुई एक गूढ़ योजना थी।
उसी समय, दूर पर्वत पर अंजनी अपनी तपस्या और आराधना में लीन बैठी थीं। वायुदेव — पवनदेव — जो सदा गतिशील रहते हैं और सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं, ने उस दिव्य प्रसाद के अंश को अपने वेग से सँभाला। भगवान शंकर के वरदान और विधाता की इच्छा से वे उस पवित्र प्रसाद को उड़ाकर सीधे अंजनी के पास ले आए।
अंजनी जब ध्यानमग्न होकर बैठी थीं, तब वह दिव्य प्रसाद कोमलता से उनकी अंजलि में आ गिरा। अंजनी ने उसे भगवान शंकर का ही आशीर्वाद और प्रसाद मानकर श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर लिया। पवनदेव ने मानो उस क्षण उस दिव्य तेज को अंजनी के जीवन तक पहुँचा दिया, जिससे महादेव के वरदान की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त हो गया।
इस प्रकार अयोध्या का यज्ञ और अंजनी की तपस्या — दोनों एक ही दिव्य सूत्र में बँध गए। एक ओर जहाँ उस प्रसाद से भगवान श्रीराम और उनके भाइयों का अवतार हुआ, वहीं दूसरी ओर पवनदेव द्वारा पहुँचाए गए उसी दिव्य अंश से उस महावीर का जन्म होने वाला था जो जीवनभर श्रीराम की सेवा में लगा रहेगा।
यह लीला हमें बताती है कि प्रभु की योजना अद्भुत और अगम्य होती है — जहाँ भक्त की तपस्या और देवताओं का आशीर्वाद अनजाने ही एक सूत्र में पिरो दिए जाते हैं।