
इंद्र का वज्र प्रहार और 'हनुमान' नाम पड़ना (टूटी हनु)
Indra Ka Vajra Prahar Aur 'Hanuman' Naam Padna
जब नन्हे हनुमान ने भगवान सूर्य को मुख में रख लिया, तो सारी सृष्टि पर घोर अंधकार छा गया। दिन-रात का क्रम बिगड़ने लगा, यज्ञ-हवन रुक गए और समस्त प्राणी व्याकुल हो उठे। घबराए हुए देवता देवराज इंद्र के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना की कि किसी प्रकार सृष्टि की इस विपत्ति को दूर करें।
देवराज इंद्र स्वयं ऐरावत हाथी पर सवार होकर उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ वह अद्भुत बालक सूर्य को मुख में लिए आकाश में विराजमान था। इंद्र ने बालक को समझाना चाहा कि वह सूर्य को छोड़ दे, किंतु क्रीड़ामग्न हनुमान न माने। तब सृष्टि की रक्षा के लिए विवश होकर इंद्र ने अपने अमोघ अस्त्र वज्र का प्रहार कर दिया।
इंद्र का वज्र नन्हे हनुमान की ठोड़ी (हनु) पर जा लगा। उस प्रहार से बालक मूर्च्छित होकर सूर्यमंडल को छोड़ते हुए पृथ्वी की ओर गिर पड़े। उनकी ठोड़ी पर चोट लग गई और वह थोड़ी टेढ़ी-सी हो गई। एक पर्वत की चट्टान पर वह दिव्य शिशु अचेत होकर पड़ा रहा। भगवान सूर्य वज्र-प्रहार के साथ ही मुक्त हो गए और पुनः तीनों लोकों में उजाला फैल गया।
जैसे ही पवनदेव को अपने प्रिय पुत्र पर हुए इस प्रहार का समाचार मिला, उनके क्रोध की सीमा न रही। परंतु उस समय की एक और महत्वपूर्ण घटना यह थी कि इस चोट के कारण ही बालक की ठोड़ी अर्थात "हनु" पर चिह्न पड़ गया। संस्कृत में ठोड़ी को "हनु" कहते हैं, और इसी हनु पर वज्र लगने के कारण उस दिव्य बालक का नाम "हनुमान" पड़ गया।
देवताओं ने जब देखा कि उनके प्रहार से वह तेजस्वी शिशु आहत हुआ है, तो वे पश्चाताप और करुणा से भर उठे। उन्हें अनुभव हुआ कि यह कोई साधारण बालक नहीं, अपितु महादेव के अंश से जन्मा दिव्य वीर है। सभी ने उस बालक की महिमा को हृदय से स्वीकार किया।
इस प्रकार जिस चोट को लोग विपत्ति समझते हैं, वही चोट हनुमान जी के लिए एक ऐसे नाम का कारण बनी जो युगों-युगों तक भक्तों के हृदय में गूँजता रहेगा। "हनुमान" — यह नाम ही उनकी अपार शक्ति, सहनशीलता और दिव्यता का प्रतीक बन गया।
टूटी हनु की यह कथा हमें यह भाव देती है कि प्रभु के जीवन में हर घटना, चाहे वह कठिन ही क्यों न हो, अंततः उनकी महिमा और नाम-गौरव का ही कारण बन जाती है।