
पवनदेव का क्रोध — वायु रोक देना और देवताओं का वरदान
Pawandev Ka Krodh — Vayu Rok Dena Aur Devtaon Ka Vardan
जब पवनदेव ने देखा कि इंद्र के वज्र-प्रहार से उनका प्रिय पुत्र मूर्च्छित होकर पर्वत पर गिर पड़ा है और उसकी ठोड़ी आहत हो गई है, तो उनका पितृ-हृदय शोक और क्रोध से भर उठा। जिस पुत्र को उन्होंने अपने दिव्य वेग से इस संसार में आने में सहायता की थी, उसी पर देवताओं का यह प्रहार उनसे सहन न हुआ।
क्रोध में भरे पवनदेव अपने अचेत पुत्र को गोद में उठाकर एक गुफा में चले गए और वहीं शोकमग्न होकर बैठ गए। तब उन्होंने एक ऐसा निश्चय किया जिससे समस्त सृष्टि थर्रा उठी — उन्होंने संसार में वायु का प्रवाह रोक दिया। वायु ही जीवन का आधार है; उसके रुकते ही प्राणियों की श्वास रुकने लगी। मनुष्य, पशु-पक्षी, देवता, ऋषि-मुनि — सभी छटपटाने लगे। यज्ञ-हवन ठप हो गए और सारी सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गई।
बिना वायु के जीवन असंभव देखकर सभी देवता, ऋषि और प्राणी अत्यंत व्याकुल हो उठे। वे समझ गए कि पवनदेव को प्रसन्न किए बिना सृष्टि का यह संकट नहीं टलेगा। तब समस्त देवगण भगवान ब्रह्मा को आगे कर पवनदेव के पास पहुँचे। भगवान ब्रह्मा ने उस गुफा में जाकर देखा कि पवनदेव अपने घायल पुत्र को गोद में लिए बैठे हैं।
ब्रह्मा जी ने करुणापूर्वक अपने हाथ से बालक हनुमान का स्पर्श किया, और उनके स्पर्शमात्र से वह दिव्य शिशु पुनः चेतना में आ गया, स्वस्थ और तेजस्वी होकर। यह देखकर पवनदेव का क्रोध कुछ शांत हुआ। तब ब्रह्मा जी बोले — "पवनदेव! तुम्हारा यह पुत्र साधारण नहीं है। इसकी महिमा को स्थिर करने के लिए हम सब इसे वरदान देंगे।"
इसके पश्चात समस्त देवताओं ने बारी-बारी से बालक हनुमान को अद्भुत वरदान प्रदान किए। ब्रह्मा जी ने उसे किसी भी ब्रह्मास्त्र से अवध्य होने का वरदान दिया। इंद्र ने वरदान दिया कि उसे वज्र से भी कभी कोई क्षति नहीं होगी। सूर्यदेव ने अपने तेज का सौवाँ भाग और ज्ञान देने का वचन दिया। यमराज ने अमरता, वरुण ने जल से अभय, कुबेर ने अजेयता, और भगवान शंकर ने अपने अस्त्रों से रक्षा का वरदान दिया। इस प्रकार हनुमान जी सर्वगुण-संपन्न, अजेय और चिरंजीवी बन गए।
इतने अद्भुत वरदान पाकर पवनदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने पुनः संसार में वायु का प्रवाह मुक्त कर दिया। सारी सृष्टि में प्राण लौट आए और चारों ओर आनंद छा गया।
यह कथा हमें यह भाव देती है कि जिस पर देवताओं का सामूहिक आशीर्वाद हो, वह अजेय और अमर हो जाता है — और हनुमान जी की महिमा इन्हीं दिव्य वरदानों से युगों तक अटल बनी रही।