
ऋषियों का श्राप — अपनी शक्ति भूल जाना
Rishiyon Ka Shrap — Apni Shakti Bhool Jana
देवताओं के अनेक वरदान पाकर बालक हनुमान असीम शक्ति और तेज के स्वामी बन गए। उनका बल इतना प्रचंड था कि उसकी कोई सीमा ही न रही। परंतु बाल्यावस्था में उस अपार शक्ति के साथ बाल-सुलभ चंचलता भी जुड़ी हुई थी, और यही चंचलता कभी-कभी अति में बदल जाती।
चित्रकूट और आसपास के वनों में अनेक ऋषि-मुनि तपस्या और यज्ञ-अनुष्ठान में लीन रहते थे। नन्हे हनुमान अपने अटूट उत्साह और बल के कारण वहाँ भी अपनी क्रीड़ाएँ करते। कभी वे ऋषियों की कुटियों की वस्तुएँ इधर-उधर कर देते, कभी यज्ञ-सामग्री बिखेर देते, तो कभी अपनी शरारतों से मुनियों की तपस्या और ध्यान में विघ्न डाल देते। उनका यह करना किसी दुर्भावना से नहीं, अपितु बाल-सुलभ भोलेपन और अत्यधिक ऊर्जा के कारण होता था।
ऋषिगण उस बालक की दिव्यता को जानते थे और आरंभ में उसकी शरारतों को स्नेहपूर्वक सह लेते थे। परंतु जब यह क्रम बढ़ने लगा और उनकी साधना में बार-बार बाधा पड़ने लगी, तो उन्हें चिंता हुई। वे जानते थे कि हनुमान भविष्य में एक महान कार्य के लिए जन्मे हैं, किंतु इस समय उनकी असीम शक्ति का अनियंत्रित प्रयोग उचित न था। बालक को स्वयं भी अपनी शक्ति का पूरा भान न था, इसलिए वह निर्भय होकर सब कुछ करते चले जाते।
तब ऋषियों ने विचारपूर्वक, बालक के हित को ध्यान में रखते हुए, उसे एक विशेष श्राप दिया। उन्होंने कहा — "हे बालक! तुम अपनी अपार शक्ति और सामर्थ्य को कुछ समय के लिए भूल जाओगे। जब तक कोई तुम्हें उसका स्मरण न कराएगा, तब तक तुम्हें अपने बल का बोध नहीं रहेगा। परंतु जब समय आएगा और कोई तुम्हारी महिमा और शक्ति की याद दिलाएगा, तब तुम्हारा समस्त बल पुनः जागृत हो उठेगा।"
यह श्राप वास्तव में श्राप कम और एक कल्याणकारी विधान अधिक था। इसके पीछे ऋषियों की दूरदर्शिता छिपी थी। वे जानते थे कि हनुमान जी को अपनी संपूर्ण शक्ति उस महान समय में प्रकट करनी है जब वे भगवान श्रीराम की सेवा में लगेंगे — विशेषकर सीता माता की खोज में समुद्र-लंघन जैसे कार्य में। इसीलिए उनकी शक्ति को उस निर्णायक घड़ी तक के लिए मानो सुरक्षित रख दिया गया।
इसी श्राप के कारण आगे चलकर, जब समुद्र पार लंका जाना था, तब हनुमान जी संकोच में पड़ गए थे, और तब जामवंत ने उन्हें उनकी दिव्य शक्ति और महिमा का स्मरण कराया। स्मरण होते ही उनका समस्त बल जाग उठा और वे विशाल रूप धारण कर समुद्र लाँघ गए।
यह कथा हमें यह भाव देती है कि प्रभु की हर लीला के पीछे एक गूढ़ योजना होती है — और सच्ची शक्ति सदा उस पावन क्षण के लिए सुरक्षित रहती है, जब उसका प्रयोग धर्म और भक्ति की सेवा में होना होता है।