Anjani Ki Tapasya Aur Putra Prapti Ka Vardan

अंजनी की तपस्या और पुत्र प्राप्ति का वरदान

Anjani Ki Tapasya Aur Putra Prapti Ka Vardan

सुदूर किष्किंधा के निकट पर्वतों की गोद में एक पवित्र वन था, जहाँ वानरराज केसरी का राज्य फैला हुआ था। केसरी की धर्मपत्नी अंजनी अत्यंत सुशीला, तेजस्विनी और भक्तिमयी नारी थीं। कहा जाता है कि पूर्वजन्म में वे पुंजिकस्थला नामक एक अप्सरा थीं, जिन्हें किसी ऋषि के श्राप के कारण वानरी रूप में जन्म लेना पड़ा। परंतु उनके हृदय में सदैव भक्ति और तप का दीपक जलता रहता था।

विवाह के अनेक वर्ष बीत गए, किंतु अंजनी की गोद सूनी ही रही। पुत्र-प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा उनके मन को व्याकुल किए रहती। एक दिन उन्होंने मतंग ऋषि के पास जाकर अपनी व्यथा कही। ऋषि ने करुणापूर्वक कहा — "पुत्री, तू वायुदेव के आराध्य, त्रिलोकपति भगवान शंकर की आराधना कर। यदि तेरी भक्ति सच्ची होगी, तो तुझे ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो तीनों लोकों में अजेय और भक्तश्रेष्ठ होगा।"

ऋषि के वचन सुनकर अंजनी का मन दृढ़ हो गया। उन्होंने वन के एकांत में, नारायणाचल पर्वत पर कठोर तपस्या का व्रत लिया। कड़ाके की सर्दी हो या तपती धूप, वर्षा की झड़ी हो या आँधी — अंजनी अडिग बैठी रहतीं। केवल फल-मूल और कभी-कभी वायु का आहार करते हुए वे निरंतर भगवान शंकर का स्मरण करती रहीं। दिन बीते, मास बीते, और वर्षों तक उनकी तपस्या चलती रही।

अंजनी की तपस्या इतनी प्रचंड हो उठी कि उसका तेज देवलोक तक पहुँचने लगा। उनके तप से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शंकर प्रकट हुए। उनके मुखमंडल पर करुणा और स्नेह की छटा थी। भोलेनाथ बोले — "पुत्री अंजनी, तेरी भक्ति और तप ने मुझे बाँध लिया है। माँग, तुझे क्या वरदान चाहिए?" अंजनी ने अश्रुपूरित नेत्रों से हाथ जोड़कर कहा — "प्रभु! मुझे ऐसा पुत्र दीजिए जो आपके ही समान बलशाली, अमर, बुद्धिमान और परम भक्त हो।"

भगवान शंकर मुस्कुराए और बोले — "तथास्तु! मैं स्वयं अपने रुद्र अंश से तेरे गर्भ में अवतार लूँगा। तेरा पुत्र वायु के समान वेगवान, समुद्र से भी गंभीर और सूर्य के समान तेजस्वी होगा। वह चिरंजीवी रहेगा और भगवान श्रीराम का परम सेवक बनकर संसार में भक्ति का आदर्श स्थापित करेगा।" इतना कहकर भोलेनाथ अंतर्धान हो गए। अंजनी का हृदय अपार आनंद से भर उठा।

इस वरदान के बाद अंजनी का जीवन नई आशा और श्रद्धा से आलोकित हो गया। वे और भी अधिक भक्तिभाव से भगवान का स्मरण करने लगीं, इस प्रतीक्षा में कि कब उनकी गोद में वह दिव्य शिशु आएगा जिसका वचन स्वयं महादेव ने दिया था।

अंजनी की यह तपस्या हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और अटूट धैर्य के आगे स्वयं देवता भी झुक जाते हैं, और भक्त की पुकार कभी अनसुनी नहीं जाती।

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