
वत्सासुर, बकासुर और अघासुर वध
Vatsasura, Bakasura aur Aghasura Vadh
वृंदावन की हरी-भरी चरागाहों में श्रीकृष्ण और बलराम अपने ग्वालबाल सखाओं के संग बछड़े चराया करते थे। यमुना के तट पर, पेड़ों की छाया में, बाँसुरी की मधुर तान और सखाओं की हँसी-ठिठोली से सारा ब्रज गूँज उठता था। परन्तु कंस अपने भानजे को मारने के लिए बार-बार असुरों को भेजता रहता, और वे मायावी दैत्य किसी न किसी रूप में वृंदावन में घुस आते।
एक दिन कंस ने वत्सासुर नामक दैत्य को भेजा। वह एक बछड़े का रूप धारण करके गौओं के झुंड में मिल गया, ताकि किसी को शंका न हो और अवसर पाकर कृष्ण पर प्रहार करे। पर अंतर्यामी श्रीकृष्ण ने उसे तुरन्त पहचान लिया। मुस्कुराते हुए वे धीरे से उसके पास गए, उसकी पिछली टाँगों और पूँछ को दृढ़ता से पकड़ा, और घुमाकर एक ऊँचे कपित्थ (कैथ) के वृक्ष पर दे मारा। वृक्ष टूट पड़ा और वत्सासुर अपने असली विशाल रूप में प्रकट होकर प्राण त्याग गया। ग्वालबालों ने आनन्द से 'साधु-साधु' कहकर कृष्ण की सराहना की।
कुछ ही दिन बाद बकासुर नामक विशाल बगुले के रूप में एक और दैत्य आया। उसका शरीर पर्वत के समान विशाल था और चोंच वज्र के समान तीखी। यमुना तट पर पानी पीने आए बालकों के बीच से उसने अचानक झपटकर श्रीकृष्ण को अपनी चोंच में दबोच लिया और निगल गया। ग्वालबाल भय से स्तब्ध रह गए। परन्तु श्रीकृष्ण ने अपने कंठ को अग्नि के समान तपा दिया, जिससे बकासुर की चोंच जलने लगी और उसने कृष्ण को उगल दिया। फिर जैसे ही उसने पुनः चोंच से प्रहार करना चाहा, कृष्ण ने उसकी दोनों चोंचों को पकड़कर घास के तिनके की भाँति चीर डाला। बकासुर धरती पर गिरकर शान्त हो गया।
इसके पश्चात आया अघासुर, जो बकासुर और पूतना का छोटा भाई था और कंस का परम विश्वासपात्र। उसने एक विशाल अजगर का रूप धारण किया — इतना बड़ा कि उसका मुख गुफा के समान खुला और होंठ बादलों को छू रहे थे। उसने योजना बनाई कि सारे ग्वालबाल और बछड़े उसके भीतर घुस आएँ तो वह उन्हें एक साथ निगल जाए और कृष्ण को भी। बालकों ने उस विशाल मुख को कोई पर्वत की गुफा समझ लिया और खेलते-खेलते बछड़ों समेत उसके भीतर चले गए।
अपने प्रिय सखाओं को असुर के उदर में जाते देख श्रीकृष्ण भी उनके पीछे भीतर प्रवेश कर गए। किन्तु भीतर जाकर उन्होंने अपने शरीर को इतना बढ़ा लिया कि अघासुर का गला अवरुद्ध हो गया और उसका दम घुटने लगा। उसके प्राण पखेरू निकलने को छटपटाने लगे और अंततः शरीर के ऊपरी छिद्र से एक तेजोमय ज्योति निकलकर आकाश में स्थिर हो गई, कृष्ण के बाहर आने की प्रतीक्षा में। कृष्ण ने अपने अमृतमयी दृष्टिपात से मृत बालकों और बछड़ों को पुनः जीवित किया और सबको लेकर हँसते-मुस्कुराते बाहर निकल आए। आकाश से देवताओं ने पुष्पवर्षा की।
इन तीनों लीलाओं का भाव यही है कि जो भक्त श्रीकृष्ण की शरण में है, उसे कोई मायावी विपत्ति नहीं हर सकती — भगवान हर संकट में स्वयं भीतर प्रवेश कर अपने प्रियजनों की रक्षा करते हैं। यही उनकी अहैतुकी करुणा की महिमा है।