
ब्रह्मा जी का मोह — बछड़ों और ग्वालों का हरण, कृष्ण का स्वयं रूप धारण
Brahma Ji Ka Moh — Bachhron aur Gwalon Ka Haran
अघासुर के उद्धार के पश्चात जब स्वयं ब्रह्मा जी ने यह अद्भुत लीला देखी, तो उनके मन में एक सूक्ष्म कौतूहल जाग उठा। वे सोचने लगे — 'क्या यह ग्वालबालक सचमुच वही परब्रह्म है? इसकी माया की परीक्षा तो लेनी चाहिए।' मोह के वश होकर उन्होंने अपनी योगमाया से समस्त बछड़ों और ग्वालबालों को उठाकर एक गुफा में छिपा दिया और स्वयं भी अदृश्य होकर उस लीला का परिणाम देखने लगे।
उस दिन बालक यमुना तट पर भोजन कर रहे थे, तभी एक बछड़ा दूर वन की ओर भाग गया। श्रीकृष्ण उसे खोजने गए, पर लौटकर आए तो देखा कि न बछड़े हैं, न सखा। अंतर्यामी कृष्ण तुरन्त समझ गए कि यह ब्रह्मा जी की माया है और उन्होंने बालकों तथा बछड़ों को छिपा दिया है। तब माताओं का हृदय और नन्द-यशोदा की ममता व्यर्थ न हो, इस विचार से करुणासागर श्रीकृष्ण ने अद्भुत लीला रची।
उन्होंने स्वयं ही अनेक रूप धारण कर लिए — जितने बछड़े थे उतने ही बछड़े बन गए, और जितने ग्वालबाल थे उतने ही ग्वालबाल भी वे स्वयं बन गए। हर बालक के ठीक वैसे ही रूप, वैसे ही वस्त्र, वैसी ही वंशी, वैसी ही चाल और वैसी ही बोली। सारे ग्वाल और सारे बछड़े अब साक्षात श्रीकृष्ण ही थे। संध्या को वे सब बछड़ों को हाँकते हुए ब्रज लौटे और अपने-अपने घर में गए।
आश्चर्य यह हुआ कि जिन माताओं ने पहले भी अपने पुत्रों को दूध पिलाया था, उनका वात्सल्य प्रेम अब पहले से भी कई गुना बढ़ गया। गौओं का दूध अपने बछड़ों के लिए स्वतः उमड़ पड़ता। ब्रजवासियों का स्नेह कृष्ण के प्रति और भी गहरा हो गया, क्योंकि अब हर घर का पुत्र और हर गोशाला का बछड़ा स्वयं परमात्मा ही था। यह लीला पूरे एक वर्ष तक चलती रही, और किसी को इसका आभास भी न हुआ।
एक वर्ष पूर्ण होने पर जब ब्रह्मा जी लौटकर देखने आए, तो चकित रह गए। जिन बालकों को उन्होंने गुफा में सुला रखा था वे तो अब भी वहीं सो रहे थे, और यहाँ वृंदावन में उतने ही बालक और बछड़े कृष्ण के संग खेल रहे थे। तभी उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखा — प्रत्येक ग्वालबाल और प्रत्येक बछड़ा चतुर्भुज विष्णुरूप में, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए, ब्रह्मादि देवताओं से पूजित, अनन्त-अनन्त रूपों में प्रकट है। यह विराट दर्शन देखकर ब्रह्मा जी की समस्त बुद्धि स्तम्भित हो गई।
अपने मोह को पहचानकर ब्रह्मा जी लज्जित हुए और श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान की स्तुति की और क्षमा माँगी। दयालु कृष्ण ने अपनी माया समेट ली, और छिपाए हुए बालक-बछड़े ज्यों के त्यों वृंदावन में आ गए, मानो कुछ हुआ ही न हो। किसी सखा को स्मरण भी न रहा कि वे एक क्षण को भी दूर हुए थे।
इस लीला की महिमा यही है कि परमात्मा की माया को जानने का प्रयास बुद्धि से नहीं, अपितु प्रेम और शरणागति से ही सम्भव है — जहाँ अहंकार गिरता है, वहीं भगवान का विराट रूप स्वयं प्रकट हो जाता है।