
चीरहरण लीला और कात्यायनी व्रत
Chirharan Leela aur Katyayani Vrat
हेमन्त ऋतु के प्रारम्भ में, मार्गशीर्ष मास में, वृंदावन की कुमारी गोपियों ने एक संकल्प लिया। वे श्रीकृष्ण को ही अपना पति रूप में पाने की कामना से देवी कात्यायनी का व्रत करने लगीं। प्रातःकाल उठकर वे यमुना में स्नान करतीं, बालू की देवी-प्रतिमा बनातीं, और चन्दन, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य से उसकी पूजा करतीं। पूरे एक मास तक वे नियमपूर्वक यह व्रत करती रहीं और मन ही मन एक ही प्रार्थना करतीं — 'हे कात्यायनी माता! नन्दनन्दन श्रीकृष्ण हमारे स्वामी हों।'
एक दिन प्रातःकाल, अपने व्रत के नियमानुसार, सभी गोपियाँ यमुना के तट पर आईं। अपने वस्त्र तट पर उतारकर वे निश्छल भाव से, गीत गाती हुई, जल में स्नान करने लगीं। उनका यह मुक्त-हृदय स्नान उनकी सरलता और भक्ति का प्रतीक था। अन्तर्यामी श्रीकृष्ण ने उनकी भक्ति की पूर्णता देखकर उन्हें व्रत का फल और एक अमूल्य शिक्षा देने का विचार किया।
श्रीकृष्ण अपने कुछ सखाओं के साथ वहाँ आए और गोपियों के उतारे हुए सभी वस्त्र समेटकर पास के एक ऊँचे कदम्ब वृक्ष पर जा चढ़े। फिर मुस्कुराते हुए बोले — 'हे व्रतधारिणी गोपियों! तुम एक-एक करके जल से बाहर आओ और अपने-अपने वस्त्र ले जाओ। मैं परिहास नहीं कर रहा, यह सत्य है।' यह सुनकर गोपियाँ लज्जावश जल में ही डूबी रहीं और उलाहना देने लगीं।
श्रीकृष्ण ने कोमल किन्तु गम्भीर स्वर में समझाया कि किसी देवता या नियम की उपासना में लाज-संकोच का पर्दा नहीं होना चाहिए; भक्त को भगवान के समक्ष पूर्ण समर्पित एवं निष्कपट होकर आना चाहिए, जैसे बालक अपनी माता के सामने। यह लीला वस्तुतः गोपियों के हृदय से अन्तिम आवरण — देह के अभिमान — को हटाकर उन्हें पूर्ण शरणागति का पाठ पढ़ा रही थी।
गोपियों ने भगवान का भाव समझ लिया। वे जल से बाहर आईं और हाथ जोड़कर, विनयपूर्वक सिर झुकाकर, अपने वस्त्र स्वीकार किए। उनके मन में कृष्ण के प्रति कोई रोष नहीं था, अपितु प्रेम और श्रद्धा और भी गहरी हो गई। प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके वस्त्र लौटा दिए और उनकी निर्मल भक्ति की प्रशंसा की।
तब भगवान ने उनके व्रत का वरदान भी प्रदान किया। उन्होंने कहा — 'तुम्हारी कामना मुझे प्राप्त करने की है, और वह अवश्य पूर्ण होगी। आने वाली शरद पूर्णिमा की रात्रि में तुम मेरे साथ रास-क्रीड़ा में सम्मिलित होकर अपनी अभिलाषा पूरी करोगी।' यह आश्वासन पाकर गोपियों का हृदय आनन्द से भर गया और वे कृतकृत्य होकर अपने-अपने घर लौटीं।
इस लीला की महिमा यही है कि भगवत्-प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ा आवरण देह और लोक का अभिमान है; जब भक्त निष्कपट होकर, सारे पर्दे त्यागकर, पूर्ण समर्पण से प्रभु के सम्मुख आता है, तभी उसका व्रत सफल होता है और भगवान स्वयं उसे अपनाते हैं।