
धेनुकासुर वध — तालवन की मुक्ति
Dhenukasura Vadh — Talvan Ki Mukti
वृंदावन के समीप एक रमणीय वन था जिसका नाम तालवन था। वहाँ ताल (ताड़) के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष पंक्तिबद्ध खड़े थे और उनके फल पके, मीठे तथा सुगन्धित थे। परन्तु उस वन पर धेनुकासुर नामक एक भयानक दैत्य का अधिकार था, जो गधे के रूप में रहता था और अपने अनेक साथियों के साथ उस वन की रक्षा किया करता था। उसके भय से न कोई मनुष्य वहाँ जाता, न कोई पशु-पक्षी। मधुर फल यों ही धरती पर गिरकर सड़ जाते।
एक दिन ग्वालबालों ने बलराम और कृष्ण से उन मीठे फलों की चर्चा की और आग्रह किया कि 'हे राम! हे श्याम! उस वन के ताल-फल बड़े स्वादिष्ट हैं, पर वहाँ एक दुष्ट दैत्य का पहरा है। यदि आप चाहें तो हमें वे फल खाने को मिलें।' अपने प्रिय सखाओं की इच्छा पूर्ण करने के लिए दोनों भाई हँसते हुए तालवन की ओर चल पड़े।
तालवन पहुँचकर बलराम जी ने अपनी बलिष्ठ भुजाओं से ताड़ के वृक्षों को इतने वेग से हिलाया कि पके फल झड़-झड़कर धरती पर बरसने लगे। फलों के गिरने की आवाज़ सुनकर धेनुकासुर क्रोध से चिंघाड़ता हुआ दौड़ा आया। उसने बलराम जी पर पीछे से अपनी पिछली टाँगों से भयंकर लात प्रहार किया। पर बलराम जी तनिक भी विचलित न हुए।
बलराम जी ने एक हाथ से उस गर्दभ-दैत्य की दोनों पिछली टाँगें पकड़ लीं और उसे घुमा-घुमाकर एक ऊँचे ताड़ के वृक्ष पर दे मारा। वृक्ष उसके भार से टूट पड़ा और धेनुकासुर के प्राण निकल गए। उसका विशाल शरीर एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जा गिरा, जिससे कई ताड़ के पेड़ ऐसे झूम उठे मानो वायु के झोंके से हिल रहे हों।
धेनुकासुर की मृत्यु का समाचार पाकर उसके सभी साथी गर्दभ-दैत्य क्रोध से भरकर बलराम और कृष्ण पर टूट पड़े। परन्तु दोनों भाइयों ने एक-एक करके उन सबको पकड़-पकड़कर ताड़ के वृक्षों पर पटक दिया। थोड़ी ही देर में सारा तालवन असुरों के शवों और गिरे हुए फलों से पट गया, और आकाश से देवताओं ने प्रसन्न होकर पुष्पवर्षा की तथा दुन्दुभि बजाई।
अब वह वन निर्भय हो गया। ग्वालबाल आनन्द से मीठे ताल-फल खाने लगे और गौएँ भी वहाँ की हरी घास चरने लगीं। जो वन कभी भय का प्रतीक था, वह अब उल्लास और स्वतंत्रता का धाम बन गया। वृंदावनवासी बलराम और कृष्ण के इस पराक्रम की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए घर लौटे।
इस लीला का भाव यही है कि जहाँ भी अधर्म का अनुचित अधिकार जमा हो और सत्जनों का हित रुका हो, वहाँ भगवान अपने भक्तों की सामान्य-सी इच्छा को निमित्त बनाकर उस बंधन को तोड़ देते हैं और भूमि को पुनः भोग्य तथा मंगलमय बना देते हैं।