
दावानल (जंगल की आग) पीना
Davanal (Jungle Ki Aag) Peena
कालिय नाग के उद्धार के पश्चात उस रात्रि सारे ग्वालबाल, गौएँ और स्वयं कृष्ण-बलराम यमुना के तट पर ही रुक गए, क्योंकि सब थके हुए थे और घर लौटने की शक्ति न थी। रात्रि में सब निश्चिन्त होकर वहीं सो गए। यमुना का जल अब निर्मल हो चुका था और वन में शीतल पवन बह रही थी, इसलिए सबको गहरी निद्रा आ गई।
आधी रात के समय उस मुंजारण्य नामक वन में अचानक भयंकर दावानल भड़क उठा। ग्रीष्म ऋतु की सूखी घास और वृक्षों के कारण आग बड़ी तीव्रता से चारों ओर फैल गई। लपटें आकाश छूने लगीं और चटचटाहट की भयानक ध्वनि से सोए हुए ग्वालबाल और गौएँ जाग उठे। उन्होंने देखा कि आग ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया है और भागने का कोई मार्ग शेष नहीं है।
भय से व्याकुल होकर सभी ग्वालबाल और गौएँ श्रीकृष्ण की शरण में दौड़े। उन्होंने कातर स्वर में पुकारा — 'हे कृष्ण! हे महाबली बलराम! यह प्रचण्ड अग्नि अभी हमें भस्म कर देगी। हम तुम्हारे प्रियजन हैं, हमें इस मृत्यु से बचाओ। तुम्हारे सिवा हमारा और कोई रक्षक नहीं।' अपने अनन्य आश्रित सखाओं और गौओं का यह करुण आर्तनाद सुनकर भगवान अनन्तशक्ति श्रीकृष्ण द्रवित हो उठे।
श्रीकृष्ण ने सबको धीरज बँधाते हुए कहा — 'तुम भयभीत मत हो, अपने नेत्र बन्द कर लो।' सबने श्रद्धापूर्वक अपनी आँखें मूँद लीं। तभी योगेश्वर कृष्ण ने अपना मुख खोला और उस समस्त प्रचण्ड दावानल को अनायास ही पी लिया, मानो वह कोई छोटी-सी चिनगारी हो। पलभर में वन की सारी अग्नि शान्त हो गई।
जब सखाओं ने आँखें खोलीं तो अत्यन्त विस्मित रह गए। न कहीं आग थी, न धुआँ, न कोई हानि। सब सुरक्षित थे और अपने-आप को पुनः उसी भाण्डीरवन के निकट खड़ा पाया, जहाँ वे पहले क्रीड़ा किया करते थे। गौएँ शान्त भाव से खड़ी थीं और वन पुनः हरा-भरा एवं मंगलमय प्रतीत हो रहा था। सभी ग्वालबाल कृष्ण को अलौकिक मानते हुए भी प्रेमवश उन्हें अपना सखा ही समझते रहे।
इस अद्भुत लीला को देखकर सखाओं का हृदय आनन्द और कृतज्ञता से भर उठा। उन्होंने अनुभव किया कि उनका यह सखा कोई साधारण बालक नहीं, अपितु समस्त संकटों को हर लेने वाला परम रक्षक है। हर्षित होकर वे बाँसुरी की तान और गीतों के साथ ब्रज की ओर लौट चले।
इस लीला का भाव यही है कि जो प्राणी पूर्ण विश्वास से भगवान की शरण में आँखें मूँदकर बैठ जाता है, उसके चारों ओर भड़की विपत्ति की अग्नि को भगवान क्षणभर में पी जाते हैं — शरणागत की रक्षा प्रभु का सहज स्वभाव है।