
प्रलंबासुर वध — बलराम द्वारा
Pralambasura Vadh — Balram Dwara
वर्षा ऋतु बीत जाने पर वृंदावन में सुहावनी शरद ऋतु का आगमन हुआ। एक दिन बलराम और कृष्ण अपने ग्वालबाल सखाओं के संग गौएँ चराते हुए वन में क्रीड़ा कर रहे थे। खेल में मन लगा तो सखाओं ने निश्चय किया कि दो दल बनाकर खेलेंगे, और जो दल जीतेगा उसके खिलाड़ी विजयी होंगे तथा हारने वाले उन्हें अपनी पीठ पर बिठाकर निश्चित स्थान तक ले जाएँगे।
इसी अवसर की ताक में कंस का भेजा हुआ प्रलंबासुर नामक दैत्य एक ग्वालबालक का रूप धरकर सखाओं के बीच घुल-मिल गया। उसकी योजना थी कि खेल के बहाने कृष्ण या बलराम को अपनी पीठ पर बिठाकर, उन्हें दूर ले जाकर उनका वध कर दे। परन्तु अन्तर्यामी श्रीकृष्ण उसकी माया को पहचान गए, फिर भी लीला रचने के भाव से उन्होंने कुछ न कहा और खेल चलने दिया।
खेल में बलराम जी के दल की विजय हुई। हारने वाले दल के सखाओं को विजयी दल के खिलाड़ियों को पीठ पर बिठाना पड़ा। छद्मवेषी प्रलंबासुर हारने वाले दल में था, अतः नियमानुसार उसे बलराम जी को अपनी पीठ पर उठाना पड़ा। यही अवसर पाकर वह बलराम को लेकर तेज़ी से निश्चित सीमा से आगे, दूर वन की ओर भागने लगा।
जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता गया, अपने भार को उठाए बलराम जी को उसका शरीर पर्वत के समान भारी और वेग असाधारण लगने लगा। तब प्रलंबासुर ने अपना बालक-रूप त्यागकर विकराल दैत्य-रूप धारण कर लिया — तपे हुए सोने-से आभूषण, अग्नि-सी चमकती आँखें और आकाश छूता विशाल शरीर। उसे इस भयंकर रूप में देखकर एक क्षण को बलराम जी भी विस्मित हुए, मानो कोई राही अचानक बाढ़ में बह चला हो।
परन्तु शीघ्र ही बलराम जी ने अपने अनन्त बल का स्मरण किया और तनिक भी भयभीत न हुए। उन्होंने क्रोधपूर्वक अपनी वज्र-सी दृढ़ मुट्ठी बाँधकर प्रलंबासुर के मस्तक पर ऐसा प्रचण्ड प्रहार किया, जैसे इन्द्र वज्र से पर्वत पर प्रहार करते हैं। उस एक ही मुक्के से दैत्य का सिर फट गया, वह रक्त वमन करता हुआ धरती पर गिर पड़ा और उसके प्राण निकल गए। पृथ्वी उसके गिरने से काँप उठी।
बलराम जी को इस भीषण संकट से सकुशल लौटा देखकर सभी ग्वालबाल हर्षित हो उठे और बार-बार 'साधु-साधु' कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे। आकाश से देवताओं ने प्रसन्न होकर बलराम जी पर पुष्पवर्षा की और उनका जय-जयकार किया। दोनों भाई गौओं को समेटकर आनन्दपूर्वक ब्रज लौट आए।
इस लीला का भाव यही है कि भगवान के धाम में अधर्म चाहे कितना ही छद्मवेष धरकर मित्र बनकर प्रवेश कर जाए, अन्ततः उसका असली रूप प्रकट होता ही है और भगवत्-शक्ति के एक ही प्रहार से नष्ट हो जाता है — बल और भक्ति जहाँ हों, वहाँ छल टिक नहीं सकता।