
उपमन्यु की कथा — क्षीरसागर का वरदान
The Story of Upamanyu — The Boy Who Won an Ocean of Milk from Shiva
१. एक निर्धन आश्रम
प्राचीन काल में व्याघ्रपाद नामक एक ऋषि थे। वे तपस्वी थे, ज्ञानी थे, परन्तु अत्यंत निर्धन थे। उनका आश्रम वन में था। न गाय थी, न धन, न संग्रह। जो कंद-मूल वन से मिल जाता, उसी से जीवन चलता। उनके पुत्र का नाम था — उपमन्यु।
२. ननिहाल में दूध का स्वाद
एक बार बालक उपमन्यु अपनी माता के साथ ननिहाल गया। वहाँ स्थिति भिन्न थी। घर में गायें थीं, समृद्धि थी। मामी ने बालक को स्नेह से दूध पीने को दिया। उपमन्यु ने जीवन में पहली बार दूध चखा। वह स्वाद उसे अत्यंत प्रिय लगा। कुछ दिन वहाँ रहकर माता-पुत्र आश्रम लौट आए।
३. दूध की माँग
आश्रम लौटकर उपमन्यु ने माता से कहा — "माता, मुझे दूध चाहिए। वैसा ही, जैसा ननिहाल में मिलता था।" माता का हृदय काँप उठा। घर में एक बूँद दूध नहीं था। न गाय थी, न उसे खरीदने का सामर्थ्य।
४. आटे का घोल
माता ने एक उपाय किया। उन्होंने थोड़ा-सा आटा जल में घोलकर सफेद कर लिया और बालक को दे दिया। उपमन्यु ने पिया — और तुरंत बोला — "माता, यह दूध नहीं है। दूध का स्वाद ऐसा नहीं होता। यह तो कुछ और है।" माता की आँखों में आँसू आ गए।
५. माता का उत्तर
उन्होंने बालक को गोद में लेकर सत्य बता दिया — "पुत्र, तुम ठीक कहते हो। यह दूध नहीं है। हमारे पास दूध नहीं है, और उसे पाने का कोई साधन भी नहीं है। हम वनवासी तपस्वी हैं। हमारे पास न गाय है, न धन। पुत्र, इस संसार में जो कुछ भी मिलता है, वह भगवान शिव की कृपा से मिलता है। जिसने उन्हें प्रसन्न कर लिया, उसे कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। यदि तुम्हें सचमुच दूध चाहिए, तो महादेव की आराधना करो। जो वे दे देंगे, वह कोई और नहीं दे सकता।"
६. बालक का संकल्प
अधिकतर बालक इतना सुनकर रो देते, या भूल जाते। परन्तु उपमन्यु ने माता की बात को केवल सांत्वना नहीं समझा — उसने उसे आदेश मान लिया। उसने कहा — "तो मैं महादेव की आराधना करूँगा। और तब तक करूँगा जब तक वे मुझे दर्शन न दें।" और वह उसी क्षण वन की ओर चल पड़ा।
७. घोर तपस्या
उपमन्यु हिमालय के एक निर्जन क्षेत्र में पहुँचा। उसने वहाँ मिट्टी का एक पार्थिव शिवलिंग बनाया और उसके सामने बैठ गया। उसने "ॐ नमः शिवाय" का जप आरंभ किया। आरंभ में उसने फल खाए। फिर पत्ते। फिर उसने सब कुछ त्याग दिया और केवल वायु पर रहकर तप करने लगा। दिन बीते, महीने बीते। बालक का शरीर सूखकर अस्थिपंजर हो गया — परन्तु उसका जप एक क्षण के लिए भी नहीं रुका। उसका तेज इतना बढ़ गया कि तीनों लोक उससे प्रभावित होने लगे। देवता चिंतित हुए — "यह बालक कौन है जिसका तप इतना प्रचंड है?"
८. शिव-पार्वती की परीक्षा
भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा — "देवी, चलो, इस बालक की परीक्षा लें। देखें कि उसकी भक्ति कितनी दृढ़ है।" उन्होंने इन्द्र का रूप धारण किया — मुकुट, वज्र, ऐरावत हाथी सहित समस्त वैभव के साथ। पार्वती जी ने इन्द्राणी का रूप लिया। वे उपमन्यु के सामने प्रकट हुए।
९. इन्द्र का प्रस्ताव
"इन्द्र" ने कहा — "हे बालक! मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ। माँगो, क्या चाहिए?" उपमन्यु ने आँखें खोलीं और विनम्रता से कहा — "देवराज, आपका आना सौभाग्य है। परन्तु मैं आपकी आराधना नहीं कर रहा। मैं भगवान शिव की आराधना कर रहा हूँ। मुझे जो चाहिए, वह मैं उन्हीं से लूँगा।"
१०. शिव की निंदा
तब "इन्द्र" ने वह किया जो सबसे बड़ी परीक्षा थी। उन्होंने शिव जी की निंदा आरंभ कर दी — "किसकी आराधना कर रहे हो? उस शिव की? जो श्मशान में रहता है? जिसके शरीर पर चिता की राख है? जो सर्प लपेटे रहता है? जिसका न कोई घर है, न कुल, न वैभव? जो स्वयं भिखारी है, वह तुम्हें क्या देगा? वह तो स्वयं भूत-प्रेतों के साथ भटकता है। छोड़ो उसे। मैं देवराज हूँ, स्वर्ग का स्वामी हूँ। मुझसे माँगो — तुम्हें सब कुछ दूँगा।"
११. उपमन्यु का क्रोध
बालक उपमन्यु का शरीर दुर्बल था, परन्तु उसकी आँखों में अग्नि जल उठी। वह उठ खड़ा हुआ और बोला — "बस! एक शब्द और नहीं! आप देवराज हैं, इसलिए मैं आपको प्रणाम करता हूँ। परन्तु जिसने मेरे आराध्य की निंदा की, वह मेरे लिए शत्रु है — चाहे वह कोई भी हो। आप जिन्हें भिखारी कह रहे हैं, वे समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। आपका इन्द्रपद भी उन्हीं की कृपा से है। मैं आपके इस अपमान को सहन नहीं करूँगा।" और उसने भूमि से मिट्टी उठाकर मंत्र पढ़ना आरंभ कर दिया — वह उस "इन्द्र" पर पाशुपत जैसे अस्त्र का प्रयोग करने को उद्यत हो गया। (कुछ पाठों में वह अपने प्राण त्यागने को उद्यत हो जाता है, यह कहते हुए कि "जिस कान ने शिव-निंदा सुनी, वह देह अब मुझे स्वीकार नहीं।")
१२. शिव का प्रकट होना
उसी क्षण वह माया समाप्त हो गई। इन्द्र का रूप विलीन हुआ और सामने स्वयं भगवान शिव माता पार्वती के साथ खड़े थे — नंदी पर विराजमान, जटाओं में चंद्रमा, मुख पर करुणा। शिव जी ने कहा — "पुत्र, शांत हो जाओ। वह मैं ही था। मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। तुम अपने आराध्य के लिए स्वयं देवराज से भिड़ने को तैयार हो गए। ऐसी निष्ठा दुर्लभ है। माँगो, क्या चाहिए?"
१३. उपमन्यु की माँग
उपमन्यु के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। वह चरणों में गिर पड़ा। उसने कहा — "प्रभु, मैं तो केवल दूध माँगने आया था। परन्तु अब जब आपके दर्शन हो गए, तो दूध क्या माँगूँ? मुझे केवल आपकी अखंड भक्ति दीजिए — कि मैं आपको कभी न भूलूँ।"
१४. क्षीरसागर का वरदान
शिव जी प्रसन्न होकर मुस्कुराए। उन्होंने कहा — "पुत्र, तुमने भक्ति माँगी — वह तो तुम्हें मिली ही। परन्तु जिस इच्छा से तुम यहाँ आए थे, वह अधूरी नहीं रहेगी। आज से तुम्हें और तुम्हारे वंश को कभी दूध की कमी नहीं होगी। मैं तुम्हें क्षीरसागर (दूध का समुद्र) प्रदान करता हूँ। तुम जब चाहो, जितना चाहो — दूध, दही, घी, अमृत — सब तुम्हें सुलभ रहेगा। और साथ ही तुम चिरंजीवी होगे, सदा युवा रहोगे, और मेरे परम भक्तों में गिने जाओगे।" उसी क्षण वहाँ एक क्षीरसागर प्रकट हो गया। उपमन्यु ने माता-पिता को बुलाकर वह अमृतमय दूध पिलाया। आश्रम की दरिद्रता सदा के लिए समाप्त हो गई।
१५. उपमन्यु का आगे का जीवन
उपमन्यु आगे चलकर एक महान ऋषि बने। महाभारत (अनुशासन पर्व) में एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग आता है — जब भगवान श्रीकृष्ण को पुत्र-प्राप्ति के लिए तप करना था, तब उन्होंने उपमन्यु ऋषि को ही अपना गुरु बनाया। उपमन्यु ने श्रीकृष्ण को पाशुपत व्रत और शिव-आराधना की दीक्षा दी। उसी तप से श्रीकृष्ण को साम्ब नामक पुत्र प्राप्त हुआ। यह प्रसंग अत्यंत विशेष है — स्वयं भगवान ने जिसे गुरु माना, वह वही बालक था जो कभी एक कटोरी दूध के लिए रोया था। (महाभारत में एक अन्य उपमन्यु का भी उल्लेख है — धौम्य ऋषि का शिष्य, जिसने गुरु-आज्ञा पालन में अंधा होकर अश्विनी कुमारों से दृष्टि पाई थी। दोनों कथाएँ भिन्न हैं, परन्तु प्रायः मिला दी जाती हैं।)
१६. कथा का सार
पहला संदेश — माता का उत्तर। यह कथा वस्तुतः एक माता की कथा भी है। उन्होंने अपने पुत्र को संसार की वास्तविकता बताई और उसे सही मार्ग दिखाया।