
नंदी की कथा
Nandi ki Katha
हर शिव मंदिर के गर्भगृह के ठीक सामने, शिवलिंग की ओर मुख किए एक बैल बैठा मिलता है। वह नंदी हैं। वे शिव जी के वाहन, द्वारपाल, प्रमुख गण और उनके परम भक्त हैं। परंपरा यह है कि शिव जी के दर्शन से पहले नंदी के दर्शन किए जाते हैं और उनके कान में अपनी प्रार्थना कही जाती है, इस विश्वास के साथ कि वे उसे शिव जी तक पहुँचा देंगे।
'नंदी' शब्द 'नंद' से बना है, जिसका अर्थ है आनंद और प्रसन्नता। नंदी वह हैं जो आनंद देते हैं और जो स्वयं आनंद में स्थित हैं। उनके अन्य नाम नंदीश्वर, नंदिकेश्वर और वृषभ भी हैं।
प्राचीन काल में शिलाद नामक एक ऋषि थे। उनके वंश में संतान न होने से उनका कुल समाप्त होने की स्थिति में था। पितरों के निर्देश पर उन्होंने घोर तप किया और शिव जी से वर माँगा कि उन्हें अयोनिज, अमर और मृत्यु से परे पुत्र प्राप्त हो। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय पश्चात् यज्ञभूमि से एक अत्यंत तेजस्वी बालक प्रकट हुआ, जिसका नाम नंदी रखा गया।
नंदी अत्यंत मेधावी थे। सात वर्ष की आयु में उन्होंने समस्त विद्याएँ सीख ली थीं। एक दिन ऋषियों ने शिलाद को बताया कि नंदी की आयु केवल आठ वर्ष है। यह सुनकर नंदी ने निर्भय होकर कहा कि जो महादेव ने दिया है, वे ही उनकी रक्षा करेंगे। नंदी वन में जाकर शिवलिंग की स्थापना कर अखंड तपस्या में लीन हो गए। शिव जी ने प्रकट होकर उन्हें अजर-अमर होने का वरदान दिया और उन्हें अपना गणाध्यक्ष, वाहन और द्वारपाल नियुक्त किया। उसी क्षण नंदी का रूप वृषभ में परिवर्तित हो गया।
नंदी से जुड़े अनेक प्रसंग हैं। समुद्र मंथन के समय जब विष निकला, तो नंदी ने उसकी बूँदें चाट लीं ताकि वे पृथ्वी पर न फैलें। एक बार रावण ने जब कैलाश जाने का प्रयास किया, तो नंदी ने उसे रोका। रावण द्वारा उपहास किए जाने पर नंदी ने श्राप दिया कि वानर ही उसके विनाश का कारण बनेंगे।
एक अन्य प्रसंग में, शिव-पार्वती के चौपड़ खेल में नंदी ने स्वामी-भक्ति के मोह में असत्य साक्षी दी, जिसके लिए उन्हें माता पार्वती से श्राप मिला। वहीं, एक बार माता पार्वती के स्नान के समय नंदी ने शिव जी को भीतर जाने से नहीं रोका, जिससे पार्वती जी को यह बोध हुआ कि नंदी का धर्म केवल शिव के प्रति है। इसी कारण उन्होंने गणेश जी की रचना की।
मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव नंदी के दोनों सींगों के मध्य खड़े होकर आनंद तांडव करते हैं। इसीलिए प्रदोष व्रत में नंदी की पूजा का विशेष विधान है और उनके सींगों के बीच से शिवलिंग का दर्शन करने की परंपरा है।