
शिव-हनुमान संबंध
Shiva-Hanuman Sambandh
हनुमान चालीसा में तुलसीदास जी लिखते हैं — 'शंकर सुवन केसरी नंदन।' अर्थात् — शंकर के पुत्र, और केसरी के नंदन। यही एक पंक्ति उस गहरे संबंध की ओर संकेत करती है जो हनुमान जी और भगवान शिव के बीच है। हनुमान जी को रुद्रावतार कहा जाता है — अर्थात् स्वयं शिव का ही एक स्वरूप। परन्तु यह मान्यता कहाँ से आई, और इसका अर्थ क्या है — यही इस कथा का विषय है।
पुराणों के अनुसार भगवान शिव के ग्यारह रुद्र स्वरूप हैं, जिन्हें एकादश रुद्र कहा जाता है। इनके नाम विभिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते हैं, परन्तु एक प्रचलित सूची इस प्रकार है — कपाली, पिंगल, भीम, विरूपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शंभु, चंड और भव। मान्यता है कि हनुमान जी इन्हीं ग्यारहवें रुद्र के अवतार हैं।
हनुमान जी को शिव-अंश मानने की सबसे प्रचलित कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब मंथन से अमृत निकला और असुर उसे लेकर भागने लगे, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया और असुरों से अमृत लेकर देवताओं को पिला दिया। यह समाचार शिव जी तक पहुँचा। उन्हें उस अद्भुत रूप को देखने की इच्छा हुई। वे माता पार्वती के साथ विष्णु लोक पहुँचे और बोले — 'मैं आपका वह मोहिनी रूप देखना चाहता हूँ।' विष्णु जी ने कहा — 'प्रभु, वह रूप देखना सरल नहीं। उसका प्रभाव अत्यंत गहरा है।' परन्तु शिव जी के आग्रह पर उन्होंने पुनः मोहिनी रूप धारण किया।
उस दिव्य रूप को देखकर एक क्षण के लिए शिव जी का मन विचलित हुआ और उनसे शिव तेज स्खलित हो गया। उस तेज को सप्तर्षियों ने संभाला और उसे वायुदेव के माध्यम से अंजना के गर्भ में स्थापित किया। इसी से हनुमान का जन्म हुआ। इसीलिए वे शंकर सुवन (शिव के पुत्र) और पवनसुत (वायु के पुत्र) — दोनों कहलाते हैं।
एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, अंजना पूर्वजन्म में पुंजिकस्थला नामक एक अप्सरा थीं, जिन्हें श्राप के कारण वानरी रूप में जन्म लेना पड़ा था। उनका विवाह वानरराज केसरी से हुआ, परन्तु वे निःसंतान थीं। उन्होंने संतान के लिए भगवान शिव की घोर तपस्या की। शिव जी प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान दिया — 'मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा।'
एक तीसरी कथा इसे रामायण से जोड़ती है। जब राजा दशरथ ने संतान के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया, तो अग्निदेव ने उन्हें एक दिव्य खीर का पात्र दिया, जो तीनों रानियों में बाँटी गई। उसी खीर का एक अंश एक पक्षी उठा ले गया और वह उस स्थान पर गिरा जहाँ अंजना तपस्या कर रही थीं। वायुदेव ने उस अंश को अंजना तक पहुँचाया, और उन्होंने उसे शिव-प्रसाद मानकर ग्रहण कर लिया। उसी से हनुमान जी का जन्म हुआ। यही कारण बताया जाता है कि राम और हनुमान का संबंध जन्म से ही जुड़ा हुआ था।
शिव जी ने हनुमान रूप में जन्म क्यों लिया? पुराणों में इसका कारण अत्यंत सुंदर बताया गया है। जब यह निश्चित हुआ कि भगवान विष्णु राम के रूप में अवतार लेंगे, तब शिव जी ने विचार किया — 'मेरे आराध्य राम पृथ्वी पर आ रहे हैं। मैं उनकी सेवा से वंचित कैसे रह सकता हूँ?' परन्तु एक कठिनाई थी। शिव जी जिस रूप में हैं, उस रूप में वे स्वयं पूज्य हैं। इसलिए उन्होंने एक ऐसा रूप चुना जिसमें कोई पहचान न सके — एक वानर का रूप।
रामेश्वरम् में यह एकत्व सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। लंका पर आक्रमण से पूर्व श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना करके पूजा की। उन्होंने हनुमान जी को ही कैलाश से लिंग लाने भेजा था। अर्थात् — शिव के अवतार को शिव का लिंग लाने भेजा गया। यह प्रसंग स्वयं में इस संबंध का प्रमाण माना जाता है।
हनुमान जी के स्वरूप और स्वभाव में शिव के अनेक लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं। गदा और वज्र शिव के त्रिशूल-सदृश शक्ति का प्रतीक हैं। सिंदूर और तेल का संबंध रुद्र-स्वरूप की उग्रता को शांत रखने से जोड़ा जाता है। लंका दहन में जो रूप उन्होंने दिखाया, वह रुद्र-भाव ही था। वहीं, राम के चरणों में वे अत्यंत विनम्र हैं। चिरंजीवी होना, ब्रह्मचर्य, वैराग्य और निष्कामता — ये सब शिव के ही गुण हैं।
इस मान्यता का सबसे गहरा अर्थ यह है कि हनुमान जी सेवा और भक्ति के सर्वोच्च आदर्श हैं। यदि वे स्वयं शिव हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि स्वयं ईश्वर ने भी सेवक बनना चुना। जो सबका स्वामी है, उसने दास बनना पसंद किया। यही भक्ति का चरम है, जहाँ स्वामी और सेवक का भेद मिट जाता है।