
द्वादश ज्योतिर्लिंग
Dwadash Jyotirlinga
ज्योतिर्लिंग क्या है?
सृष्टि के आदि में जब ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तब उनके मध्य एक विशाल अग्निस्तंभ प्रकट हुआ, जिसका न आदि था और न अंत। उसी से भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि यह उनका ही निराकार स्वरूप है। इसी ज्योति-स्तंभ के कारण इसका नाम ज्योतिर्लिंग पड़ा। मान्यता है कि भारत के बारह स्थानों पर शिव जी इसी ज्योति-स्वरूप में स्वयं प्रकट हुए। ये मानव-निर्मित नहीं, स्वयंभू माने जाते हैं।
१. सोमनाथ — गुजरात
स्थान: प्रभास क्षेत्र, वेरावल, सौराष्ट्र। अरब सागर के तट पर।
कथा: प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से किया था, इस वचन के साथ कि वे सबके साथ समान व्यवहार करेंगे। परन्तु चंद्रमा केवल रोहिणी से प्रेम करते थे, जिससे शेष छब्बीस उपेक्षित रहीं। बार-बार समझाने पर भी न मानने पर दक्ष ने श्राप दिया कि चंद्रमा का तेज नष्ट हो जाएगा। चंद्रमा का क्षय आरंभ हुआ और सृष्टि व्याकुल हो उठी। ब्रह्मा जी की सलाह पर चंद्रमा प्रभास क्षेत्र आए और छह महीने तक महामृत्युंजय मंत्र का जप किया। शिव जी प्रसन्न हुए और उन्होंने श्राप को आधा कर दिया। चंद्रमा ने कृतज्ञ होकर वहीं मंदिर बनवाया, जिसे सोमनाथ कहा गया।
२. मल्लिकार्जुन — आंध्र प्रदेश
स्थान: श्रीशैलम पर्वत, कृष्णा नदी के तट पर।
कथा: कार्तिकेय रुष्ट होकर क्रौंच पर्वत पर चले गए थे। शिव-पार्वती पुत्र-वियोग सह न सके और उन्हें मनाने वहाँ पहुँचे। कार्तिकेय ने माता-पिता के आगमन की सूचना पाकर और दूर जाने का प्रयास किया, परन्तु शिव-पार्वती ने वहीं ज्योति रूप में स्थित होने का निश्चय किया। पार्वती जी ने मल्लिका के पुष्प अर्पित किए और शिव जी यहाँ अर्जुन वृक्ष के नीचे विराजे, इसीलिए नाम पड़ा मल्लिकार्जुन। यह एकमात्र स्थान है जो ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों है।
३. महाकालेश्वर — मध्य प्रदेश
स्थान: उज्जैन, शिप्रा नदी के तट पर।
कथा: उज्जयिनी में वेदप्रिय नामक एक ब्राह्मण रहते थे। दूषण नामक एक असुर ने नगर पर आक्रमण कर ब्राह्मणों पर अत्याचार आरंभ कर दिया। जब वह शिव-पूजा में लीन ब्राह्मण पुत्रों को मारने आया, तब भूमि फटी और महाकाल के रूप में स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने एक ही हुंकार से दूषण को भस्म कर दिया। भक्तों की प्रार्थना पर शिव जी वहीं महाकालेश्वर के रूप में स्थित हो गए। यह एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है।
४. ओंकारेश्वर — मध्य प्रदेश
स्थान: नर्मदा नदी के मध्य मांधाता द्वीप, खंडवा ज़िला।
कथा: विंध्य पर्वत ने शिव जी की आराधना की थी। शिव जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्होंने विंध्य को वरदान दिया। ऋषियों की प्रार्थना पर शिव जी ने वहाँ सदा निवास करना स्वीकार किया। तब वह लिंग दो भागों में विभक्त हुआ — ओंकारेश्वर और ममलेश्वर। यह द्वीप स्वयं ॐ के आकार का है। यहीं आदि शंकराचार्य को उनके गुरु गोविंदपाद मिले थे।
५. केदारनाथ — उत्तराखंड
स्थान: गढ़वाल हिमालय, मंदाकिनी नदी के तट पर।
कथा: महाभारत युद्ध के बाद पांडव गोत्र-हत्या के पाप से मुक्ति चाहते थे। शिव जी ने महिष का रूप धारण कर लिया था। भीम ने बैल की पीठ पकड़ ली और शिव जी ने पांडवों की भक्ति देखकर उन्हें क्षमा कर दिया। बैल के अंग जहाँ-जहाँ प्रकट हुए, वहाँ पंच केदार बने। केदारनाथ में शिव जी का कूबड़ प्रकट हुआ था। यहाँ का लिंग त्रिकोणाकार पिंड के रूप में है।
६. भीमाशंकर — महाराष्ट्र
स्थान: सह्याद्रि पर्वतमाला, पुणे ज़िला।
कथा: कुंभकर्ण के पुत्र भीमा ने ब्रह्मा जी से वरदान पाकर देवताओं पर अत्याचार आरंभ कर दिया। उसने शिव-भक्त राजा सुदक्षिण को बंदी बना लिया। राजा ने कारागार में ही मिट्टी का शिवलिंग बनाकर पूजा आरंभ कर दी। क्रोधित भीमा ने तलवार उठाकर उस लिंग पर प्रहार किया, तो उसी क्षण उस लिंग से स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने भीमा का अंत किया।