
शिव द्वारा असुर संहार
Shiva the Destroyer of Demons
भूमिका
भगवान शिव को संहारकर्ता कहा जाता है, परन्तु उनका संहार कभी क्रोध से नहीं, सदा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए होता है। यहाँ पाँच प्रमुख असुरों की कथाएँ हैं, जिनका अंत शिव जी के हाथों हुआ। इनमें से एक भी कथा केवल युद्ध और वध की कथा नहीं है, हर एक में एक गहन शिक्षा छिपी है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इनमें से लगभग सभी असुर शिव के ही भक्त थे। उनका पतन भक्ति की कमी से नहीं, अहंकार की अधिकता से हुआ।
भाग एक — बाणासुर
बाणासुर दानवराज बलि का ज्येष्ठ पुत्र था और प्रह्लाद का प्रपौत्र। उसकी एक हजार भुजाएँ थीं और वह अत्यंत बलशाली था। उसकी राजधानी शोणितपुर थी। बाणासुर शिव जी का अनन्य भक्त था। कहा जाता है कि जब शिव जी तांडव तांडव करते थे, तब बाणासुर अपनी हजार भुजाओं से वाद्य बजाकर संगत करता था। इससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उसे वरदान दिया कि वे स्वयं उसकी नगरी के द्वार पर रक्षक बनकर रहेंगे।
समय के साथ बाणासुर का बल उसके सिर चढ़ गया। एक दिन उसने शिव जी से कहा कि मेरी हजार भुजाएँ खुजला रही हैं, मुझे युद्ध की इच्छा है। शिव जी ने कहा कि तुम्हारा गर्व भंग होगा। बाणासुर की पुत्री उषा ने स्वप्न में अनिरुद्ध को देखा और उनसे प्रेम कर बैठी। जब बाणासुर को यह ज्ञात हुआ, तो उसने अनिरुद्ध को नागपाश में बाँध दिया। नारद जी द्वारा समाचार पाकर श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न यादव सेना लेकर शोणितपुर पहुँचे।
घोर युद्ध आरंभ हुआ। बाणासुर की ओर से स्वयं भगवान शिव और कार्तिकेय लड़ रहे थे। श्रीकृष्ण ने शिव जी पर जृम्भास्त्र चलाया, जिससे शिव जी क्षण भर को निद्रा-भाव में चले गए। फिर श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से बाणासुर की भुजाएँ काटनी आरंभ कीं। तब शिव जी ने हस्तक्षेप किया और श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि यह मेरा भक्त है, इसका वध मत कीजिए। श्रीकृष्ण ने बाणासुर की चार भुजाएँ शेष छोड़ दीं और उसे जीवनदान दिया। बाणासुर का समस्त अहंकार गल गया और उसने उषा और अनिरुद्ध का विवाह करा दिया।
भाग दो — अंधकासुर
एक बार माता पार्वती ने क्रीड़ावश पीछे से आकर शिव जी के दोनों नेत्र अपने हाथों से ढक दिए। उस अंधकार से एक विकराल, अंधा बालक उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पड़ा अंधक। शिव जी ने वह बालक दैत्यराज हिरण्याक्ष को दे दिया। अंधक ने घोर तप करके ब्रह्मा जी से वर प्राप्त किया कि मेरी मृत्यु तभी हो जब मैं अपनी माता के समान किसी स्त्री पर कुदृष्टि डालूँ।
अंधक ने तीनों लोकों को जीत लिया और एक दिन कैलाश पर माता पार्वती के सौंदर्य पर मोहित हो गया। भीषण युद्ध हुआ। अंधक के पास शक्ति थी कि उसके रक्त की जो बूँद भूमि पर गिरती, उससे एक नया अंधक उत्पन्न हो जाता। तब शिव जी ने मातृकाओं को प्रकट किया, जिन्होंने रक्त को भूमि पर गिरने से पहले ही पी लिया। अंततः शिव जी ने अपने त्रिशूल से अंधक को उठाकर आकाश में धारण कर लिया। जब अंधक का अहंकार नष्ट हो गया, तब शिव जी ने उसे मुक्त किया और अपने गणों में स्थान दिया।
भाग तीन — जालंधर
शिव जी के क्रोध-तेज से समुद्र में एक अत्यंत बलशाली पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम जालंधर था। जालंधर का विवाह दैत्यराज कालनेमि की पुत्री वृंदा से हुआ। वृंदा अत्यंत पतिव्रता थीं और उनके पातिव्रत्य के बल पर ही जालंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था। जालंधर ने स्वर्ग जीत लिया और कैलाश पर चढ़ाई कर दी। उसने राहु को दूत बनाकर शिव जी के पास भेजा और माता पार्वती को सौंपने की अनुचित माँग की।