
चंद्रमा को श्राप और सोमनाथ की स्थापना
The Curse on the Moon and the Founding of Somnath
१. प्रजापति दक्ष और उनकी सत्ताईस कन्याएँ
प्रजापति दक्ष की अनेक कन्याएँ थीं। उनमें से सत्ताईस कन्याओं का विवाह उन्होंने चंद्रमा (सोम) के साथ किया।
ये सत्ताईस कन्याएँ ही आकाश के सत्ताईस नक्षत्र हैं — अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य आदि।
विवाह के समय दक्ष ने चंद्रमा से एक स्पष्ट वचन लिया —
"तुम मेरी सभी पुत्रियों के साथ समान व्यवहार करोगे। किसी के साथ पक्षपात नहीं करोगे।"
चंद्रमा ने वचन दिया।
२. रोहिणी के प्रति पक्षपात
परन्तु समय के साथ चंद्रमा वचन भूल गए।
सत्ताईस पत्नियों में से उन्हें रोहिणी सर्वाधिक प्रिय लगीं। उनका समस्त समय, स्नेह और ध्यान केवल रोहिणी पर केंद्रित हो गया।
शेष छब्बीस उपेक्षित रह गईं। उनका कोई दोष नहीं था, फिर भी वे प्रतीक्षा में दिन काटतीं।
बहुत समय तक उन्होंने सहा। फिर उन्होंने चंद्रमा से कहा भी — परन्तु चंद्रमा ने उनकी बात को महत्व नहीं दिया।
३. पिता के पास शिकायत
अंततः वे सब अपने पिता दक्ष के पास पहुँचीं और अपनी व्यथा सुनाई —
"पिताजी, हमारे पति ने आपको दिया वचन तोड़ दिया है। वे केवल रोहिणी को ही अपना मानते हैं। हमारा अस्तित्व उनके लिए शून्य है।"
दक्ष ने चंद्रमा को बुलाकर समझाया — "तुमने वचन दिया था। सब मेरी पुत्रियाँ हैं। किसी के साथ अन्याय मत करो।"
चंद्रमा ने सिर हिला दिया, परन्तु उनका व्यवहार नहीं बदला।
दक्ष ने दूसरी बार समझाया, तीसरी बार भी।
परन्तु चंद्रमा अपने सौंदर्य और तेज के अहंकार में डूबे थे। उन्होंने ससुर की बात को गंभीरता से लिया ही नहीं।
४. श्राप
अंततः दक्ष का धैर्य टूट गया।
क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दे दिया —
"तुम्हें अपने तेज और सौंदर्य का अहंकार है। आज से तुम्हें क्षय रोग लगेगा। तुम्हारा तेज प्रतिदिन घटता जाएगा और अंततः तुम पूर्णतः नष्ट हो जाओगे।"
५. चंद्रमा का क्षय
श्राप तत्काल फलित हुआ।
उसी दिन से चंद्रमा की कलाएँ घटने लगीं। प्रतिदिन उनका तेज कम होता गया, शरीर क्षीण होता गया।
और इसका प्रभाव केवल चंद्रमा तक सीमित नहीं रहा —
औषधियाँ निस्तेज होने लगीं (क्योंकि चंद्रमा को ओषधीश कहा जाता है)।
समुद्र का ज्वार-भाटा बिगड़ने लगा।
वनस्पतियाँ मुरझाने लगीं।
रात्रि का प्रकाश समाप्त होने लगा।
तीनों लोक व्याकुल हो उठे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा।
६. क्षमा-याचना विफल
चंद्रमा को अब अपनी भूल का बोध हुआ।
वे दक्ष के पास गए और क्षमा माँगी। परन्तु दक्ष ने कहा —
"मेरा श्राप वापस नहीं हो सकता। जो कहा, वह होकर रहेगा।"
चंद्रमा ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने कहा —
"मैं भी इसे नहीं रोक सकता। यह श्राप केवल एक ही टाल सकते हैं — भगवान शिव। क्योंकि वे ही मृत्यु और क्षय के स्वामी हैं। जाओ, प्रभास क्षेत्र में जाकर उनकी आराधना करो।"
७. प्रभास क्षेत्र में तपस्या
चंद्रमा प्रभास क्षेत्र पहुँचे — जो आज गुजरात के सौराष्ट्र में वेरावल के निकट स्थित है, जहाँ सरस्वती, हिरण्य और कपिला — तीन नदियाँ समुद्र में मिलती हैं (त्रिवेणी संगम)।
वहाँ उन्होंने एक शिवलिंग स्थापित किया और घोर तपस्या आरंभ की।
उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र का जप किया —
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"
कहा जाता है कि उन्होंने छह महीने तक अखंड तप किया — निराहार, निर्जल, अविचल।
८. शिव का प्रकट होना
अंततः भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए।
चंद्रमा ने चरणों में गिरकर प्रार्थना की —
"प्रभु, मेरी भूल थी। मैंने वचन तोड़ा और अन्याय किया। मैं दंड का पात्र हूँ। परन्तु मेरे क्षय से समस्त सृष्टि पीड़ित हो रही है। कृपा कीजिए।"
९. मध्यमार्ग का समाधान
शिव जी ने कहा —
"चंद्र, तुमने वास्तव में अपराध किया है। दक्ष का श्राप मिथ्या नहीं है — वह न्यायसंगत था।
परन्तु दंड का उद्देश्य विनाश नहीं, सुधार होता है।
इसलिए मैं उस श्राप को समाप्त तो नहीं करूँगा, पर उसे आधा कर दूँगा —
कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिनों में तुम्हारी कलाएँ घटेंगी — यह दक्ष के श्राप का सम्मान है।
शुक्ल पक्ष के पंद्रह दिनों में तुम्हारी कलाएँ बढ़ेंगी — यह मेरा वरदान है।
इस प्रकार न श्राप मिथ्या होगा, न सृष्टि नष्ट होगी।"
१०. चंद्रकला का जन्म
इसी वरदान से आज का क्रम बना —
अमावस्या से पूर्णिमा तक चंद्रमा बढ़ते हैं।
पूर्णिमा से अमावस्या तक घटते हैं।
और यही चक्र सदा चलता रहेगा।
चंद्रमा के इस पुनर्जीवन से औषधियाँ पुनः जीवित हो गईं, समुद्र का क्रम लौट आया, और सृष्टि सामान्य हो गई।
११. सोमनाथ की स्थापना
कृतज्ञ होकर चंद्रमा ने वहीं एक भव्य मंदिर बनवाया।
चंद्रमा का एक नाम है सोम। और शिव उनके स्वामी बने — इसलिए वह लिंग कहलाया सोमनाथ, अर्थात् "सोम के नाथ"।
शिव जी ने चंद्रमा को यह वरदान भी दिया कि वे सदा उनके मस्तक पर विराजमान रहेंगे — इसीलिए शिव जी चंद्रशेखर कहलाते हैं।
(एक भाव यह भी है कि जो क्षयग्रस्त और लांछित था, शिव ने उसे अपने मस्तक पर धारण कर लिया — यही उनकी करुणा का प्रमाण है।)
१२. प्रथम ज्योतिर्लिंग
सोमनाथ को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का आरंभ ही इसी से होता है —
"सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्..."
१३. मंदिर का इतिहास — विध्वंस और पुनर्निर्माण
सोमनाथ मंदिर का इतिहास भारत के सबसे मार्मिक अध्यायों में से एक है।
मान्यता के अनुसार पहला मंदिर स्वयं चंद्रदेव ने स्वर्ण का बनवाया, फिर रावण ने रजत का, फिर श्रीकृष्ण ने चंदन का, और फिर राजा भीमदेव ने पाषाण का।
(यह परंपरागत मान्यता है, ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।)
ऐतिहासिक रूप से यह मंदिर अपनी समृद्धि के लिए प्रसिद्ध था और इसीलिए बार-बार आक्रमण का लक्ष्य बना।
सन् 1026 में महमूद गजनवी ने इस पर सबसे प्रसिद्ध आक्रमण किया और मंदिर को ध्वस्त कर दिया।
इसके बाद भी यह मंदिर कई बार तोड़ा गया और हर बार पुनः बनाया गया।
१४. आधुनिक पुनर्निर्माण
स्वतंत्रता के पश्चात् सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प से इस मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ हुआ।
11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वर्तमान मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की।
आज यह मंदिर अरब सागर के तट पर भव्य रूप में खड़ा है। इसके समुद्र-तट पर एक स्तंभ है — बाणस्तंभ, जिस पर लिखा है कि यहाँ से सीधे दक्षिण दिशा में अंटार्कटिका तक कोई भूमि नहीं है।
१५. कथा का सार
पहला संदेश — पक्षपात अन्याय है। चंद्रमा ने किसी को मारा नहीं, कोई चोरी नहीं की। उनका अपराध केवल इतना था कि उन्होंने कुछ को प्रेम दिया और कुछ की उपेक्षा की। पुराण इसे इतना बड़ा दोष मानते हैं कि उसका दंड क्षय-रोग हुआ। उपेक्षा भी हिंसा का ही एक रूप है।
दूसरा संदेश — वचन-भंग। दक्ष ने विवाह के समय वचन लिया था। जो वचन देकर भूल जाए, वह विश्वासघात करता है।
तीसरा संदेश — दंड का उद्देश्य। शिव जी ने श्राप हटाया नहीं, आधा किया। न्याय का उद्देश्य किसी को समाप्त करना नहीं, सुधारना है। यह भारतीय दंड-दर्शन का सबसे सुंदर उदाहरण है।
चौथा संदेश — घटना-बढ़ना जीवन का नियम है। चंद्रमा भी सदा पूर्ण नहीं रहते। जीवन में उतार आना पराजय नहीं, प्रकृति है। जो घटता है, वही बढ़ता भी है।
पाँचवाँ संदेश — शिव ने लांछित को मस्तक पर धारण किया। जिसे सबने दोषी ठहराया, उसे शिव ने अपने सिर पर बिठा लिया। करुणा वही है जो दोषी को भी स्थान दे।
छठा संदेश — सोमनाथ का इतिहास। यह मंदिर बार-बार टूटा और बार-बार बना। यह उसी चंद्र-कथा का विस्तार है — क्षय होता है, पर अंत नहीं होता। जो घटता है, वह पुनः बढ़ता है।
१६. एक विनम्र निवेदन
इस कथा के कुछ पाठभेद हैं। शिव पुराण, स्कंद पुराण (प्रभास खंड), महाभारत और भागवत में विवरण थोड़े भिन्न हैं।
कहीं श्राप का स्वरूप भिन्न है, कहीं तप की अवधि भिन्न। मंदिर के निर्माण-क्रम की परंपरागत मान्यताएँ भी ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं।
किसी एक पाठ को अंतिम मान लेना उचित नहीं। कथा का मर्म सर्वत्र एक ही है — न्याय और करुणा साथ-साथ चलें, तभी संतुलन बनता है।