
शिकारी की कथा — अनजाने में हुआ शिवरात्रि व्रत
The Hunter's Unknowing Vigil
महाशिवरात्रि के व्रत में जो कथा सबसे अधिक सुनाई जाती है, वह किसी ऋषि या राजा की नहीं है। वह एक ऐसे व्यक्ति की कथा है जिसने जानबूझकर कोई पूजा नहीं की, कोई मंत्र नहीं पढ़ा, कोई संकल्प नहीं लिया। फिर भी उसे वह प्राप्त हुआ जो बड़े-बड़े तपस्वियों को नहीं मिलता। यह कथा शिकारी गुरुद्रुह की है — जिसे कुछ पाठों में गुण निधि, कहीं सुस्वर, तो कहीं केवल "एक व्याध" कहा गया है।
वाराणसी के निकट एक वन में गुरुद्रुह नामक एक शिकारी रहता था। उसका जीवन कठोर था। वह प्रतिदिन वन में जाता, पशु-पक्षियों का शिकार करता और उसी से अपने परिवार का भरण-पोषण करता। उसके घर में वृद्ध माता-पिता, पत्नी और छोटे बच्चे थे। वह क्रूर नहीं था — वह केवल विवश था। यही उसका कुल-धर्म था और यही उसकी आजीविका। धर्म-कर्म, व्रत-उपवास, मंदिर-पूजा — इनसे उसका कोई परिचय नहीं था। उसने कभी शिवरात्रि का नाम तक नहीं सुना था।
एक दिन — जो संयोगवश फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी, अर्थात् महाशिवरात्रि का दिन था — शिकारी प्रातः ही वन में निकला। परन्तु उस दिन दुर्भाग्य उसके साथ था। सुबह से शाम तक वह भटकता रहा, परन्तु एक भी शिकार हाथ नहीं आया। न कोई मृग दिखा, न कोई पक्षी। सूर्य अस्त हो गया। वह थका, भूखा और निराश था। घर में परिवार प्रतीक्षा कर रहा होगा — और वह खाली हाथ है। उसने निश्चय किया — "आज रात मैं लौटूँगा नहीं। रात में जल पीने के लिए कोई न कोई पशु अवश्य आएगा। मैं तालाब के किनारे प्रतीक्षा करूँगा।"
वह एक तालाब के किनारे पहुँचा। वहाँ एक बेल का वृक्ष था। शिकारी उस पर चढ़ गया, ताकि नीचे आने वाले पशुओं पर सरलता से बाण चला सके और स्वयं सुरक्षित रहे। उसे यह ज्ञात नहीं था — परन्तु उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जो पत्तों और धूल से ढका हुआ था।
रात गहराने लगी। शिकारी नींद से लड़ रहा था। यदि वह सो जाता, तो वृक्ष से गिर सकता था और शिकार भी चूक जाता। इसलिए वह जागता रहा। यह अनजाने में "रात्रि जागरण" हो गया — जो शिवरात्रि व्रत का सबसे प्रमुख अंग है। और चूँकि उसे दिनभर कुछ खाने को नहीं मिला था, वह निराहार भी था। यह अनजाने में "उपवास" हो गया।
रात का पहला प्रहर बीतते-बीतते एक गर्भवती मृगी जल पीने आई। शिकारी ने धनुष पर बाण चढ़ाया। धनुष खींचते समय उसकी कोहनी की हलचल से वृक्ष हिला और कुछ बेलपत्र तथा उसकी जल-मशक से कुछ जल की बूँदें नीचे गिरीं। वे बेलपत्र और जल ठीक उसी शिवलिंग पर गिरे। यह अनजाने में "बिल्वपत्र अर्पण" और "जलाभिषेक" हो गया — वह भी प्रथम प्रहर की पूजा के समय। मृगी ने आहट सुनकर ऊपर देखा और काँपते हुए बोली — "हे व्याध, मैं गर्भवती हूँ। यदि तुम मुझे मारोगे तो दो जीवन जाएँगे। मुझे अपने बच्चे को जन्म देने दो। मैं वचन देती हूँ — प्रसव के बाद मैं स्वयं लौटकर तुम्हारे सामने आ जाऊँगी।" शिकारी को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। परन्तु मृगी ने बार-बार शपथ ली। अंततः शिकारी का हृदय पिघला और उसने उसे जाने दिया।
कुछ समय बाद एक और मृगी वहाँ आई। शिकारी ने फिर धनुष उठाया — और फिर वृक्ष हिला, फिर बेलपत्र और जल शिवलिंग पर गिरे। दूसरे प्रहर की पूजा संपन्न हो गई। इस मृगी ने कहा — "हे शिकारी, मैं अभी-अभी प्रसव करके आई हूँ। मेरे नवजात शिशु अकेले हैं। मुझे जाने दो — मैं उन्हें उनके पिता को सौंपकर लौट आऊँगी।" शिकारी ने कहा — "पहली भी यही कहकर गई थी।" मृगी ने विनती की और शपथ ली। शिकारी ने पुनः दया करके उसे छोड़ दिया।
तीसरे प्रहर में एक और मृगी आई — जो अपने छोटे बच्चों के साथ थी। फिर वही हुआ — धनुष उठा, वृक्ष हिला, बेलपत्र और जल शिवलिंग पर गिरे। तीसरे प्रहर की पूजा भी हो गई। इस मृगी ने कहा — "मेरे बच्चे छोटे हैं। इन्हें इनके पिता के पास पहुँचाकर मैं लौट आऊँगी।" शिकारी अब क्रोधित होने लगा — परन्तु उसके भीतर कुछ बदल रहा था। वह जो हिंसा करने आया था, वह बार-बार करुणा से हार रहा था। उसने इसे भी जाने दिया।
रात्रि के अंतिम प्रहर में एक विशाल मृग वहाँ आया। शिकारी ने अंतिम बार धनुष उठाया — और फिर वृक्ष हिला, फिर बेलपत्र और जल शिवलिंग पर गिरे। चारों प्रहर की पूजा पूर्ण हो गई। मृग ने कहा — "हे व्याध, मैं वही हूँ जिसकी तीन पत्नियाँ तुम्हारे पास आ चुकी हैं। वे तीनों तुम्हें वचन देकर गई हैं। मैं उन्हें वचन-भंग का दोषी नहीं होने दूँगा। मुझे मार दो, परन्तु मुझे भी एक अवसर दो — मैं जाकर उन्हें और अपने बच्चों को विदा कर आऊँ। फिर हम सब मिलकर तुम्हारे सामने आ जाएँगे। यदि हम न आएँ, तो हमें वह पाप लगे जो झूठी शपथ लेने वालों को लगता है।"
यह सुनकर शिकारी के भीतर कुछ टूट गया। उसने सोचा — "ये पशु हैं — और इनमें कितना सत्य है, कितना प्रेम है, कितनी मर्यादा है। एक-दूसरे के लिए प्राण देने को तैयार हैं। और मैं मनुष्य होकर केवल मारना जानता हूँ। मेरा जीवन इनसे भी हीन है।" वह वृक्ष से नीचे उतरा। उसने अपना धनुष-बाण फेंक दिया और कहा — "जाओ, तुम सब स्वतंत्र हो। मैं आज से किसी की हिंसा नहीं करूँगा।"
आश्चर्य यह हुआ कि वह मृग परिवार वास्तव में लौट आया — सब एक साथ, अपने वचन का पालन करने। उन्होंने कहा — "हम आ गए। अब आप अपना कर्तव्य कीजिए।" शिकारी की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कहा — "मैं तुम्हें नहीं मार सकता। तुमने मुझे वह सिखा दिया जो कोई गुरु नहीं सिखा सका।"
उसी क्षण आकाश में प्रकाश फैल गया। स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए और बोले — "हे व्याध, तुमने अनजाने में ही सही, परन्तु आज महाशिवरात्रि का सम्पूर्ण व्रत किया है — तुम दिनभर निराहार रहे — यह उपवास हुआ। तुम रातभर जागते रहे — यह जागरण हुआ। तुमने चारों प्रहर में बिल्वपत्र और जल मुझ पर अर्पित किए — यह अभिषेक हुआ। और सबसे बड़ी बात — तुमने चार बार अपनी हिंसा त्यागकर करुणा चुनी — यही सबसे बड़ी पूजा थी।"
शिव जी ने कहा — "जाओ, तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हुए। तुम्हें मेरा धाम प्राप्त होगा।" (कुछ पाठों में कहा जाता है कि यही शिकारी अगले जन्म में राजा गुह (निषादराज) बना, जो भगवान श्रीराम का प्रिय मित्र था और जिसने उन्हें गंगा पार कराई थी।) और उस मृग परिवार को भी शिव जी ने वरदान दिया — मान्यता है कि उन्हें आकाश में स्थान मिला, और मृगशिरा नक्षत्र उन्हीं का प्रतीक माना जाता है।
पहला संदेश — अनजाने में किया गया शुभ कर्म भी निष्फल नहीं जाता। शिकारी को यह पता ही नहीं था कि वह पूजा कर रहा है। शुभ कर्म का फल हमारी जानकारी पर नहीं, कर्म पर निर्भर है। दूसरा संदेश — असली व्रत क्या है। यह कथा बहुत सूक्ष्मता से बताती है कि व्रत का सार भूखा रहना नहीं है, बल्कि हृदय की शुद्धि और करुणा है।