
प्रदोष व्रत कथा
Pradosh Vrat Katha
प्रदोष का अर्थ है — संध्या और रात्रि का संधिकाल, अर्थात् सूर्यास्त के ठीक बाद का समय। प्रत्येक मास के दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को, सूर्यास्त के लगभग डेढ़ घंटे का यह समय प्रदोष काल कहलाता है। यह वही समय है जब न पूरा दिन रहता है, न पूरी रात। न प्रकाश, न अंधकार। और यही शिव तत्व है — जो दोनों के बीच है, जो द्वंद्व से परे है। मान्यता है कि इसी बेला में भगवान शिव कैलाश के रजत भवन में आनंद तांडव करते हैं, और समस्त देवगण उनकी स्तुति करते हैं। इसीलिए इस समय की गई प्रार्थना शीघ्र स्वीकार होती है।
प्रदोष व्रत की मूल कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब देवताओं और असुरों ने क्षीरसागर का मंथन किया, तो सबसे पहले अमृत नहीं, हलाहल विष निकला। उसकी ज्वालाओं से तीनों लोक जलने लगे। न देवता सह सके, न असुर। सब भागकर कैलाश पहुँचे। भगवान शिव ने समस्त विष अपनी अंजुलि में लेकर पी लिया। माता पार्वती ने उनका कंठ दबा दिया, जिससे विष कंठ में ही रुक गया और वे नीलकंठ कहलाए।
विष का संकट टलते ही देवता प्रसन्न हो गए और मंथन में पुनः लग गए। अमृत निकला, उन्होंने उसे बाँटकर पी लिया। परन्तु फिर उन्हें बोध हुआ कि हमने बहुत बड़ी भूल की। जिसने हमारे लिए विष पिया, हमने उसी को भूलकर अमृत का आनंद ले लिया। हमने उन्हें धन्यवाद तक नहीं दिया। पश्चात्ताप से भरकर वे सब कैलाश पहुँचे और शिव-पार्वती से क्षमा माँगी।
मान्यता है कि यह क्षमा-याचना त्रयोदशी तिथि की प्रदोष बेला में हुई थी। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर सबको क्षमा कर दिया। उस समय वे इतने आनंदित हुए कि उन्होंने नंदी के दोनों सींगों के मध्य खड़े होकर आनंद तांडव किया। देवताओं ने स्तुति की, गंधर्वों ने गान किया, अप्सराओं ने नृत्य किया। इसीलिए प्रदोष काल में नंदी की पूजा का विशेष महत्व है, और नंदी के सींगों के बीच से शिवलिंग का दर्शन करने की परंपरा है। शिव जी ने वरदान दिया कि जो भी भक्त त्रयोदशी की प्रदोष बेला में मेरी पूजा करेगा, उसके समस्त पाप नष्ट होंगे और उसे मनोवांछित फल मिलेगा।
प्राचीन काल में एक नगर में एक विधवा ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी और घर में कोई साधन नहीं था। वह अपने छोटे पुत्र को लेकर प्रतिदिन भिक्षा माँगती और उसी से दोनों का पेट भरता। वह अत्यंत धर्मपरायण थी और नियमपूर्वक प्रदोष व्रत करती थी। एक दिन भिक्षा माँगकर लौटते समय उसने नदी के किनारे एक घायल बालक को पड़ा देखा। वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता का वध कर राज्य छीन लिया था, और वह भागते-भागते वहाँ तक पहुँचा था। ब्राह्मणी को दया आ गई। उसने उस बालक को अपने घर ले जाकर अपने पुत्र के समान पाला। अब उसके दो पुत्र थे — अपना ब्राह्मण पुत्र और यह राजकुमार।
एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे। वहाँ उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएँ क्रीड़ा करती हुई मिलीं। उनमें से एक थीं अंशुमती, जो गंधर्वराज की पुत्री थीं। धर्मगुप्त और अंशुमती की दृष्टि मिली और दोनों एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट हो गए। अंशुमती ने अपने पिता से उस युवक का परिचय कराया। गंधर्वराज ने पूछताछ की और जब उसे ज्ञात हुआ कि यह युवक एक निर्वासित राजकुमार है, तो वह असमंजस में पड़ गया। उसी रात उसे स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए। शिव जी ने कहा कि यह बालक धर्मगुप्त है, विदर्भ का उत्तराधिकारी। यह उस ब्राह्मणी के आश्रय में पला है जो नियमपूर्वक प्रदोष व्रत करती है। इसके भाग्य में राज्य है। तुम निःसंकोच अपनी पुत्री का विवाह इससे करो। गंधर्वराज ने प्रातः ही धूमधाम से अंशुमती का विवाह धर्मगुप्त से कर दिया।
विवाह के पश्चात् गंधर्वराज ने अपनी सेना धर्मगुप्त को दी। धर्मगुप्त ने उस सेना के साथ विदर्भ पर आक्रमण किया, शत्रुओं को पराजित किया और अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। राजा बनने के बाद धर्मगुप्त ने उस ब्राह्मणी और उसके पुत्र को ससम्मान अपने पास बुलाया। उसने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया और ब्राह्मणी को माता का स्थान दिया। जब लोगों ने पूछा कि यह सब कैसे संभव हुआ, तो धर्मगुप्त ने कहा कि यह सब उस माता के प्रदोष व्रत का फल है। उसने जो व्रत अपने लिए किया था, उसका फल मुझ अनाथ को भी मिला।
प्रदोष व्रत की एक विशेषता यह है कि यह जिस वार को पड़ता है, उसके अनुसार उसका फल भिन्न माना जाता है। रवि प्रदोष (रविवार) — दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य। सोम प्रदोष (सोमवार) — मनोकामना पूर्ति और मानसिक शांति। यह सर्वाधिक शुभ माना जाता है। भौम प्रदोष (मंगलवार) — ऋण से मुक्ति और रोग-नाश। बुध प्रदोष (बुधवार) — शिक्षा, बुद्धि और संतान-सुख। गुरु प्रदोष (बृहस्पतिवार) — शत्रु-नाश और यश-वृद्धि। शुक्र प्रदोष (शुक्रवार) — दांपत्य सुख और सौभाग्य। शनि प्रदोष (शनिवार) — संतान-प्राप्ति और खोया हुआ पद वापस मिलना। यह भी विशेष फलदायी माना जाता है।
व्रत की विधि में प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को सूर्योदय से पूर्व स्नान करके संकल्प लें। दिनभर निराहार अथवा फलाहार रहें। सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पहले पुनः स्नान करें और स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करें। प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। बिल्वपत्र, सफेद पुष्प, चंदन, अक्षत, धतूरा और भस्म अर्पित करें। ॐ नमः शिवाय का जप करें, शिव चालीसा पढ़ें और नंदी की पूजा करें। अंत में कथा सुनकर आरती करें और प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें।