
पार्वती की तपस्या और शिव-विवाह
Parvati ki Tapasya aur Shiv-Vivah
सती के देहत्याग के पश्चात् भगवान शिव संसार से पूर्णतः विरक्त हो गए। वे कैलाश की एक कंदरा में गहन समाधि में लीन हो गए। न किसी से बात, न कोई कार्य, न कोई इच्छा। युगों तक यही अवस्था रही। सृष्टि का क्रम रुक-सा गया। शिव के बिना कल्याण कैसे हो?
उसी काल में तारकासुर नामक एक महाबली दैत्य ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। उसने अमरता का वर माँगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि यह असंभव है, जिसने जन्म लिया उसे मरना ही होगा। तब तारकासुर ने अत्यंत चतुराई से वर माँगा कि उसकी मृत्यु केवल शिव के पुत्र के हाथों हो, और वह भी तब जब वह मात्र सात दिन का हो। उसका गणित सीधा था कि शिव समाधि में हैं और वे पुनः विवाह करेंगे ही नहीं। ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह दिया। वर पाते ही तारकासुर ने तीनों लोकों पर आक्रमण कर दिया। उसने इन्द्र को स्वर्ग से निकाल दिया, देवताओं को बंदी बनाया और ऋषियों के यज्ञ नष्ट किए। चारों ओर हाहाकार मच गया।
उधर सती ने हिमालयराज हिमवान और रानी मैना के घर पुत्री रूप में जन्म लिया। पर्वतराज की पुत्री होने से वे पार्वती कहलाईं। बाल्यकाल से ही उनका मन शिव में रमा हुआ था। एक दिन देवर्षि नारद पधारे और उन्होंने हिमवान से कहा कि यह कन्या साधारण नहीं है, इसका विवाह स्वयं महादेव से होगा। माता मैना यह सुनकर चिंतित हुईं, परन्तु पार्वती के मुख पर तेज आ गया।
देवताओं ने विचार किया कि तारकासुर का वध तभी संभव है जब शिव जी विवाह करें। अतः पार्वती जी को शिव जी की सेवा में भेजा गया। पार्वती जी प्रतिदिन कैलाश जातीं, कंदरा को स्वच्छ करतीं और पुष्प अर्पित करतीं, परन्तु शिव जी की समाधि नहीं टूटी। देवताओं ने अधीर होकर कामदेव को भेजा। कामदेव ने अपनी शक्ति से वहाँ वसंत ऋतु प्रकट कर दी और शिव जी पर सम्मोहन बाण चलाया। बाण लगते ही शिव जी की समाधि विचलित हुई और उन्होंने आँखें खोलीं। परन्तु अगले ही क्षण शिव जी को आभास हुआ कि यह बाहरी शक्ति द्वारा प्रेरित है। उनका क्रोध जागा और उन्होंने तृतीय नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया।
रति देवी के विलाप पर शिव जी ने करुणावश कहा कि तुम्हारा पति अब अनंग कहलाएगा और द्वापर में पुनः देह धारण करेगा। इस घटना के बाद शिव जी अंतर्ध्यान हो गए। पार्वती जी को सीख मिली कि शिव को केवल तप और समर्पण से पाया जा सकता है। उन्होंने राजमहल का सुख त्याग दिया और वन में जाकर घोर तपस्या आरंभ की।
पार्वती जी की तपस्या अत्यंत कठोर थी। ग्रीष्म में पंचाग्नि तप, वर्षा में खुले आकाश के नीचे और शीत में बर्फीले जल में खड़े होकर उन्होंने तप किया। आहार क्रमशः घटता गया और अंततः उन्होंने पत्ते भी त्याग दिए, जिससे उनका नाम अपर्णा पड़ा। उनके तप का तेज इतना बढ़ा कि देवता व्याकुल हो उठे।
शिव जी ने सप्तर्षियों को उनकी परीक्षा लेने भेजा। ऋषियों ने उन्हें शिव के अवगुण गिनाकर हतोत्साहित करना चाहा, परन्तु पार्वती जी अपने संकल्प पर अडिग रहीं। अंत में स्वयं शिव जी ने एक वटु ब्रह्मचारी का रूप धारण कर उनकी परीक्षा ली। उन्होंने शिव की निंदा की, तो पार्वती जी क्रोधित होकर वहाँ से जाने लगीं। तब शिव जी ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर दिया और कहा कि आज से वे उनके अधीन हैं। इसके बाद सप्तर्षि विवाह का प्रस्ताव लेकर हिमालय पहुँचे और शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ।