
महाशिवरात्रि की कथा
Mahashivratri Katha
१. महाशिवरात्रि क्या है
वर्ष के प्रत्येक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहा जाता है — अर्थात् बारह शिवरात्रियाँ।
परन्तु इनमें से एक सर्वोपरि है — फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी।
यही महाशिवरात्रि है — "शिव की महान रात्रि"।
यह वर्ष की वह रात्रि मानी जाती है जब शिव तत्व पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है, और साधना का फल सहस्रगुना हो जाता है।
२. यह "रात्रि" ही क्यों?
अधिकांश हिन्दू पर्व दिन में मनाए जाते हैं — होली, दीपावली, नवरात्रि, राम नवमी।
परन्तु शिवरात्रि रात्रि का पर्व है। क्यों?
क्योंकि शिव निराकार, निर्गुण, अनंत हैं। और अंधकार अनंत का प्रतीक है — प्रकाश सीमित होता है, अंधकार असीम।
रात्रि विश्राम की, अंतर्मुखता की, और ध्यान की अवस्था है। दिन में मन बाहर की ओर दौड़ता है, रात्रि में भीतर की ओर मुड़ता है।
इसीलिए यह पर्व जागरण का है — बाहरी नींद त्यागकर भीतरी जागरण का।
३. पहली कथा — लिंगोद्भव (शिव का प्रकट होना)
महाशिवरात्रि से जुड़ी सर्वाधिक प्रमुख कथा लिंगोद्भव की है।
सृष्टि के आदि में ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। विवाद युद्ध तक पहुँच गया और सृष्टि संकट में पड़ गई।
तभी उन दोनों के मध्य एक विशाल अग्निस्तंभ प्रकट हुआ — जिसका न आदि दिखता था, न अंत।
आकाशवाणी हुई — "जो इसका छोर खोज लेगा, वही श्रेष्ठ है।"
ब्रह्मा जी हंस बनकर ऊपर उड़े, विष्णु जी वराह बनकर नीचे गए। हजारों वर्ष बीते, परन्तु किसी को छोर न मिला।
विष्णु जी ने सत्य स्वीकार कर लिया। ब्रह्मा जी ने केतकी पुष्प की झूठी साक्षी दिलवाई।
तब उस स्तंभ से स्वयं शिव प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि पृथ्वी पर उनकी पूजा नहीं होगी, केतकी को अपनी पूजा से वर्जित किया, और विष्णु जी को समान पूजनीय होने का वरदान दिया।
मान्यता है कि यह लिंगोद्भव फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की उसी रात्रि को हुआ था। इसीलिए वह रात्रि महाशिवरात्रि कहलाई।
४. दूसरी कथा — शिव-पार्वती विवाह
एक दूसरी अत्यंत प्रचलित मान्यता यह है कि इसी रात्रि को शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था।
सती के देहत्याग के बाद शिव जी दीर्घकाल तक समाधि में लीन रहे। पार्वती जी ने वर्षों घोर तप किया, समस्त परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं, और अंततः शिव जी ने उन्हें स्वीकार किया।
इसीलिए महाशिवरात्रि पर अविवाहित कन्याएँ व्रत रखती हैं — इस कामना से कि उन्हें शिव जैसा वर मिले।
और विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु तथा दांपत्य सुख के लिए व्रत करती हैं।
५. तीसरी कथा — नीलकंठ
एक तीसरी मान्यता समुद्र मंथन से जुड़ी है।
जब मंथन से हलाहल विष निकला और तीनों लोक जलने लगे, तब भगवान शिव ने वह विष पी लिया। माता पार्वती ने उनका कंठ दबा दिया, जिससे विष कंठ में ही रुक गया और वे नीलकंठ कहलाए।
विष के ताप को शांत करने के लिए देवताओं ने रातभर जागकर उनकी सेवा की, जल अर्पित किया और स्तुति की।
वह रात्रि-जागरण ही शिवरात्रि की परंपरा बना।
(यह मान्यता अधिकतर श्रावण मास से जोड़ी जाती है, परन्तु शिवरात्रि से भी जोड़ी जाती है।)
६. चौथी कथा — तांडव
चौथी मान्यता के अनुसार इसी रात्रि को भगवान शिव ने सृष्टि, स्थिति और संहार का तांडव किया था।
इसीलिए इस रात्रि को नृत्य, संगीत और भजन-कीर्तन का विशेष महत्व माना जाता है।
७. पाँचवीं कथा — शिकारी की कथा (व्रत कथा)
व्रत के समय जो कथा सर्वाधिक सुनाई जाती है, वह एक शिकारी की है।
एक शिकारी दिनभर शिकार न मिलने से भूखा रहा, और रात को एक बेल के वृक्ष पर चढ़कर प्रतीक्षा करता रहा। उसे यह ज्ञात नहीं था कि उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग है।
रात के चारों प्रहर में जब-जब वह धनुष उठाता, वृक्ष हिलता और बेलपत्र तथा जल की बूँदें नीचे शिवलिंग पर गिरतीं।
और चारों बार जो मृग सामने आए — गर्भवती मृगी, प्रसूता मृगी, बच्चों वाली मृगी और अंत में स्वयं मृग — सबकी प्रार्थना सुनकर उसने उन्हें छोड़ दिया।
इस प्रकार अनजाने में उससे उपवास, रात्रि जागरण, चारों प्रहर का अभिषेक और चार बार अहिंसा — सब कुछ हो गया।
प्रसन्न होकर शिव जी ने उसे मोक्ष प्रदान किया।
(इसी कथा से चार प्रहर की पूजा की परंपरा जुड़ी है।)
८. व्रत की विधि
उपवास — दिनभर निराहार अथवा फलाहार। जल, फल, दूध और कुट्टू/सिंघाड़े का आहार लिया जाता है।
संकल्प — प्रातः स्नान करके शिव मंदिर में या घर पर संकल्प लिया जाता है।
चार प्रहर की पूजा — रात्रि को चार भागों में बाँटकर प्रत्येक प्रहर में अभिषेक किया जाता है।
रात्रि जागरण — पूरी रात जागकर शिव-स्मरण, भजन, मंत्र जप।
पारण — अगले दिन प्रातः स्नान करके व्रत का पारण।
९. चार प्रहर की पूजा में क्या चढ़ता है
परंपरा के अनुसार प्रत्येक प्रहर में अलग द्रव्य से अभिषेक होता है —
प्रथम प्रहर — जल से
द्वितीय प्रहर — दही से
तृतीय प्रहर — घी से
चतुर्थ प्रहर — शहद से
(क्षेत्र और परंपरा के अनुसार इसमें भिन्नता है — कहीं दूध, गन्ने का रस और पंचामृत भी सम्मिलित होते हैं।)
१०. शिव जी को क्या प्रिय है
बिल्वपत्र — सर्वाधिक प्रिय। तीन पत्तियाँ त्रिनेत्र, त्रिगुण और त्रिकाल की प्रतीक हैं। उल्टा करके, चिकनी सतह लिंग की ओर रखकर चढ़ाया जाता है।
जल — सादा जल भी पर्याप्त है। शिव को महँगे द्रव्य नहीं चाहिए।
भस्म — वैराग्य का प्रतीक।
धतूरा और आक — जिन्हें संसार त्याग देता है, शिव उन्हें स्वीकार करते हैं।
भाँग — शीतलता का प्रतीक (विष के ताप से जुड़ी परंपरा)।
रुद्राक्ष, चंदन, सफेद पुष्प।
क्या नहीं चढ़ता — केतकी (झूठी साक्षी के श्राप के कारण), तुलसी (जालंधर-वृंदा प्रसंग के कारण), हल्दी और कुमकुम (ये सौभाग्य-द्रव्य हैं, और शिव वैरागी हैं)।
(ये परंपराएँ क्षेत्र के अनुसार कुछ भिन्न हो सकती हैं।)
११. मुख्य मंत्र
पंचाक्षर मंत्र — ॐ नमः शिवाय
महामृत्युंजय मंत्र —
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
रुद्राष्टाध्यायी / रुद्राभिषेक — मंदिरों में विशेष रूप से किया जाता है।
१२. व्रत का वास्तविक अर्थ
यहाँ एक बात समझना अत्यंत आवश्यक है।
व्रत का अर्थ केवल भूखा रहना नहीं है।
"व्रत" शब्द का अर्थ है — संकल्प।
उपवास का अर्थ है "उप" (निकट) + "वास" (रहना) — अर्थात् ईश्वर के निकट रहना।
यदि दिनभर भूखे रहकर भी मन में क्रोध, लोभ और द्वेष भरा रहे, तो वह व्रत नहीं — केवल भूख है।
शिकारी वाली कथा यही सिखाती है — उसका असली व्रत तब हुआ जब उसने चार बार अपनी भूख से बड़ा किसी और के जीवन को माना।
१३. योग-दृष्टि से महाशिवरात्रि
योग परंपरा में इस रात्रि का एक और अर्थ है।
मान्यता है कि इस रात्रि को पृथ्वी की उत्तरी गोलार्ध की स्थिति ऐसी होती है कि मानव शरीर में ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊर्ध्वगामी (ऊपर की ओर) होती है।
इसीलिए इस रात्रि में रीढ़ सीधी रखकर बैठने का विशेष महत्व बताया जाता है — ताकि वह ऊर्ध्वगामी ऊर्जा सहज रूप से ऊपर उठ सके।
यही कारण है कि इस रात्रि को सोना नहीं, जागकर बैठना कहा गया है।
१४. प्रमुख स्थान
काशी विश्वनाथ (वाराणसी) — यहाँ महाशिवरात्रि पर शिव-पार्वती विवाह का उत्सव और भव्य शोभायात्रा निकलती है।
उज्जैन (महाकालेश्वर) — यहाँ नौ दिन का शिव नवरात्रि उत्सव चलता है, और महाशिवरात्रि पर सेहरा बाँधा जाता है।
सोमनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम, भीमाशंकर — सभी ज्योतिर्लिंगों पर विशेष आयोजन।
पशुपतिनाथ (नेपाल) — यहाँ लाखों साधु एकत्र होते हैं।
१५. कथा का सार
पहला संदेश — शिव सबके हैं। शिकारी की कथा हो या कण्णप्पा की, या भस्मासुर जैसे असुर की — शिव ने कभी जाति, विधि या पात्रता नहीं देखी। जो पुकारे, उसे स्वीकार कर लिया।
दूसरा संदेश — शिव को वैभव नहीं, भाव चाहिए। उन्हें सोने-चाँदी की आवश्यकता नहीं। एक लोटा जल और एक बेलपत्र पर्याप्त है। इसीलिए वे भोलेनाथ कहलाते हैं — गरीब से गरीब व्यक्ति भी उनकी पूजा कर सकता है।
तीसरा संदेश — जागरण का अर्थ। यह रात्रि केवल आँखें खुली रखने की नहीं है। जागना अर्थात् सजग होना — अपने भीतर के अंधकार से।
चौथा संदेश — अनजाने में किया शुभ भी निष्फल नहीं जाता। शिकारी को पता ही नहीं था कि वह पूजा कर रहा है। शुभ कर्म का फल हमारी जानकारी पर नहीं, कर्म पर निर्भर करता है।
१६. एक विनम्र निवेदन
महाशिवरात्रि से जुड़ी कथाओं में बहुत विविधता है। शिव पुराण, स्कंद पुराण, गरुड़ पुराण, लिंग पुराण और पद्म पुराण — सबमें अलग-अलग प्रसंग दिए गए हैं।
कहीं यह लिंगोद्भव की रात्रि है, कहीं विवाह की, कहीं विषपान की।
ये परस्पर विरोधी नहीं हैं — ये सब उसी एक रात्रि के विभिन्न आयाम हैं।
पूजा-विधि और निषिद्ध द्रव्यों की परंपराएँ भी क्षेत्र के अनुसार बदलती हैं। अपने कुल की परंपरा का पालन करना ही सर्वोत्तम है।
सार यही है — विधि जो भी हो, भाव सच्चा होना चाहिए। शिव विधि के नहीं, भाव के भूखे हैं।