
सोलह सोमवार व्रत कथा
Somvar Vrat Katha
सप्ताह के सातों दिन किसी न किसी देवता को समर्पित हैं। सोमवार भगवान शिव का दिन माना जाता है। इसका कारण भी उन्हीं की एक कथा में है। 'सोम' का अर्थ है चंद्रमा। जब प्रजापति दक्ष के श्राप से चंद्रमा क्षय-रोग से ग्रस्त हो गए, तब उन्होंने प्रभास क्षेत्र में शिव जी की आराधना की और शिव जी ने उन्हें पुनर्जीवन दिया। कृतज्ञ चंद्रमा ने वहीं सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की, और शिव जी ने उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर लिया। चूँकि चंद्रमा को शिव जी ने अपनाया, इसलिए सोमवार उन्हीं का दिन बना। एक और भाव यह भी है कि चंद्रमा मन का कारक है और शिव मन के स्वामी हैं। इसलिए सोमवार का व्रत मन की चंचलता और अशांति को शांत करने का व्रत माना जाता है।
सामान्य सोमवार व्रत प्रत्येक सोमवार को किया जाने वाला व्रत है। सोलह सोमवार व्रत लगातार सोलह सोमवार तक किया जाने वाला संकल्पित व्रत है। यह सर्वाधिक प्रसिद्ध है और इसी की कथा नीचे दी गई है। श्रावण सोमवार व्रत श्रावण मास के सभी सोमवार को किया जाता है, जो सर्वाधिक फलदायी माने जाते हैं। प्रदोष व्रत त्रयोदशी को किया जाता है, जो सोमवार पड़ने पर सोम प्रदोष कहलाता है।
बहुत समय पहले मृदुपुरी नामक एक सुंदर नगरी थी। वहाँ का राजा अत्यंत धर्मपरायण और प्रजावत्सल था। उसने नगर में एक भव्य शिव मंदिर बनवाया था, जिसकी ख्याति दूर-दूर तक थी। एक बार भगवान शिव और माता पार्वती भ्रमण करते हुए उसी नगरी में पधारे और उस मंदिर में विश्राम करने लगे। एकांत पाकर माता पार्वती ने शिव जी से कहा कि स्वामी, बहुत समय हो गया, आइए आज चौपड़ खेलते हैं। शिव जी ने स्वीकार किया और खेल आरंभ हुआ।
उसी समय मंदिर का पुजारी — एक ब्राह्मण — वहाँ पूजा करने आया। जब खेल समाप्त हुआ, तो शिव-पार्वती में विवाद हो गया कि जीत किसकी हुई। पार्वती जी ने उस ब्राह्मण को बुलाकर पूछा कि बताओ, इस खेल में कौन जीता? ब्राह्मण असमंजस में पड़ गया। सत्य यह था कि पार्वती जी जीती थीं, परन्तु ब्राह्मण शिव जी का पुजारी था। उसने सोचा कि यदि मैंने कह दिया कि देवी जीतीं, तो मेरे स्वामी की हार होगी। और उसने कह दिया कि महादेव जीते हैं।
माता पार्वती को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा कि तूने भक्ति के नाम पर असत्य बोला। साक्षी का धर्म केवल सत्य होता है, पक्षपात नहीं। जा, तुझे कोढ़ रोग हो जाएगा। तत्काल उस ब्राह्मण का शरीर रोग से ग्रस्त हो गया। वह पीड़ा से तड़प उठा और मंदिर में ही पड़ा रहने लगा। कुछ समय बीता। एक दिन कुछ देवकन्याएँ उस मंदिर में पूजा करने आईं। उन्होंने उस रोगग्रस्त ब्राह्मण को देखा और उसकी दशा पर दया करके पूछा कि आपकी यह अवस्था कैसे हुई? ब्राह्मण ने रोते हुए सारी बात बता दी कि उसने असत्य साक्ष्य दिया था और माता पार्वती ने श्राप दे दिया।
देवकन्याओं ने कहा कि आपने भूल की है, परन्तु प्रायश्चित का मार्ग भी है। आप सोलह सोमवार का व्रत कीजिए। प्रत्येक सोमवार को स्नान करके शिव जी की पूजा कीजिए, दिनभर उपवास रखिए, संध्या के समय चूरमा बनाइए, उसे तीन भागों में बाँटकर एक भाग शिव जी को अर्पित कीजिए, एक भाग ब्राह्मणों या भक्तों में बाँटिए और एक भाग स्वयं ग्रहण कीजिए। सत्रहवें सोमवार को उद्यापन कीजिए। इस व्रत से आपका रोग अवश्य दूर होगा। ब्राह्मण ने श्रद्धापूर्वक सोलह सोमवार का व्रत किया। व्रत पूर्ण होते ही उसका कोढ़ पूर्णतः समाप्त हो गया और उसका शरीर पहले से भी अधिक तेजस्वी हो गया।
कुछ समय पश्चात् शिव-पार्वती पुनः उसी मंदिर में आए। पार्वती जी ने ब्राह्मण को स्वस्थ देखकर आश्चर्य से पूछा कि तुम्हारा रोग कैसे दूर हुआ? ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत की सारी बात बताई। माता पार्वती को यह व्रत अत्यंत प्रिय लगा। उस समय माता पार्वती एक चिंता से ग्रस्त थीं कि उनके पुत्र कार्तिकेय उनसे रुष्ट होकर दूर चले गए थे। उन्होंने स्वयं सोलह सोमवार का व्रत किया। व्रत पूर्ण होते ही कार्तिकेय का मन बदल गया और वे स्वयं माता के पास लौट आए।
कार्तिकेय ने माता से पूछा कि मेरा मन अचानक आपकी ओर कैसे खिंच आया? पार्वती जी ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत के बारे में बताया। कार्तिकेय के मन में भी एक चिंता थी कि उनका एक प्रिय ब्राह्मण मित्र था, जो अत्यंत निर्धन था और विदेश गया हुआ था। कार्तिकेय ने भी वह व्रत किया और शीघ्र ही उनका मित्र लौट आया, वह भी समृद्ध होकर। उस मित्र ने कार्तिकेय से पूछा कि मेरा भाग्य अचानक कैसे बदल गया? कार्तिकेय ने उसे सोलह सोमवार व्रत बताया। उस ब्राह्मण की एक ही इच्छा थी कि उसे एक सुंदर, गुणवती पत्नी चाहिए थी। उसने विधिपूर्वक सोलह सोमवार का व्रत किया।
उसी समय एक नगर के राजा ने अपनी पुत्री का स्वयंवर रचाया। राजा ने एक विचित्र विधि रखी कि एक हथिनी को माला देकर सभा में छोड़ा गया, और घोषणा हुई कि वह जिसके गले में माला डालेगी, राजकुमारी का विवाह उसी से होगा। हथिनी सबको छोड़कर सीधे उस निर्धन ब्राह्मण के पास पहुँची और उसके गले में माला डाल दी। राजा ने अपनी पुत्री का विवाह उसी ब्राह्मण से कर दिया। विवाह के बाद राजकुमारी ने अपने पति से पूछा कि आप निर्धन थे, फिर भी हथिनी ने आपको ही क्यों चुना? ब्राह्मण ने उसे सोलह सोमवार व्रत के बारे में बताया। राजकुमारी निःसंतान थी। उसने भी संतान की कामना से सोलह सोमवार का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसे एक अत्यंत सुंदर, गुणवान और दीर्घायु पुत्र प्राप्त हुआ।
जब वह बालक बड़ा हुआ, तो उसने अपनी माता से पूछा कि मेरा जन्म कैसे हुआ? माता ने उसे सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई। तब उस बालक ने भी यह व्रत किया कि उसे एक बड़ा राज्य मिले। व्रत के प्रभाव से एक निकटवर्ती राज्य के राजा ने अपनी पुत्री का विवाह उससे किया और उसे अपना राज्य भी सौंप दिया। राजा बनने के बाद उस युवक ने व्रत जारी रखा। एक सोमवार उसने अपनी रानी से कहा कि आज शिव मंदिर में पूजा है, आप भी चलिए और प्रसाद ग्रहण कीजिए। परन्तु रानी उस समय अपने श्रृंगार और सुख-वैभव में व्यस्त थी और उसने जाने से मना कर दिया।