
अमरकथा — अमरनाथ की पावन कथा
Amar Katha - The Immortal Tale of Amarnath
कैलाश पर एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से एक ऐसा प्रश्न पूछा, जो उनके मन में बहुत समय से था। उन्होंने देखा कि शिव जी के गले में जो मुंडमाला है, उसमें मुंडों की संख्या निरंतर बढ़ती रहती है। उन्होंने पूछा, "स्वामी, यह मुंडमाला बढ़ती क्यों जाती है?"
शिव जी ने कहा, "देवी, इसमें एक मुंड तुम्हारे प्रत्येक जन्म का है। जब-जब तुम देह त्यागती हो, तब-तब एक मुंड इसमें जुड़ जाता है।" पार्वती जी विस्मित हुईं, "तो आप अमर हैं और मैं बार-बार मृत्यु को प्राप्त होती हूँ? ऐसा क्यों?" शिव जी ने कहा, "क्योंकि मैं अमरकथा का ज्ञाता हूँ। जो इस कथा को सुन लेता है, वह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।"
पार्वती जी ने तत्काल आग्रह किया कि उन्हें भी वह अमरकथा सुनाई जाए। शिव जी ने समझाया कि यह कथा साधारण नहीं है और इसे सुनाने के लिए ऐसा स्थान चाहिए जहाँ कोई तीसरा प्राणी न हो। पार्वती जी के हठ के आगे शिव जी को स्वीकार करना पड़ा।
शिव जी ने कहा, "तो चलो, ऐसे स्थान की ओर चलते हैं जहाँ कोई न हो। परन्तु मार्ग में जो कुछ मेरे साथ है, वह सब छोड़ता जाऊँगा।" यहीं से उस यात्रा का आरंभ हुआ, जो आज भी अमरनाथ यात्रा के रूप में जानी जाती है। शिव जी ने क्रमशः एक-एक करके सब कुछ त्यागा। पहलगाम में उन्होंने नंदी को छोड़ा, चंदनवाड़ी में चंद्रमा को, शेषनाग में सर्पों को, महागुणस पर्वत पर गणेश जी को और पंचतरणी में पाँचों तत्वों का त्याग किया। अंत में, उन्होंने तांडव करके समस्त जीव-जंतुओं को दूर कर दिया और पार्वती जी के साथ अकेले रह गए।
अंततः वे एक गुफा में पहुँचे, जो आज अमरनाथ गुफा कहलाती है। वहाँ शिव जी ने कालाग्नि प्रकट की ताकि कोई सूक्ष्म जीव भी कथा न सुन सके। फिर उन्होंने आसन लगाकर अमरकथा सुनाना आरंभ किया। कथा अत्यंत दीर्घ थी और घंटों चलती रही। आरंभ में पार्वती जी उत्तर देती रहीं, परन्तु धीरे-धीरे उन्हें निद्रा आ गई। शिव जी समाधि-भाव में लीन होकर कथा सुनाते रहे और उन्हें ज्ञात ही नहीं हुआ कि पार्वती सो चुकी हैं।
गुफा में मृगछाला के नीचे दो कबूतरों के अंडे थे, जो कालाग्नि से बच गए थे। कथा सुनते हुए उन अंडों से दो शुक निकल आए, जो हुंकारी भर रहे थे। कथा समाप्त होने पर शिव जी ने देखा कि पार्वती जी निद्रा में हैं। उन्होंने चौंककर पूछा कि अब तक 'हूँ' कौन कह रहा था? तभी उनकी दृष्टि उन दो कबूतरों पर पड़ी। वे समझ गए कि इन्होंने अमरकथा सुन ली है। क्रोधित होकर शिव जी ने त्रिशूल उठाया, तो कबूतरों ने प्रार्थना की कि अब वे अमर हो चुके हैं। शिव जी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने उन्हें अभयदान दिया। मान्यता है कि आज भी उस गुफा में वे कबूतर दिखाई देते हैं।
इसी गुफा में छत से टपकती जल-बूँदें जमकर एक प्राकृतिक हिमलिंग का निर्माण करती हैं। यह शिवलिंग चंद्रमा की कलाओं के साथ घटता-बढ़ता है। गुफा में शिव, पार्वती और गणेश की तीन हिम-आकृतियाँ मानी जाती हैं।
कालांतर में यह गुफा विस्मृत हो गई थी। प्रचलित लोक-कथा के अनुसार, लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व बूटा मलिक नामक एक गड़रिए को एक साधु ने कोयले की थैली दी, जो घर पहुँचकर स्वर्ण मुद्रा में बदल गई। साधु को खोजने पर उसे यह पवित्र गुफा मिली। यह तीर्थ आज भी साझा संस्कृति का प्रतीक माना जाता है।
अमरनाथ गुफा जम्मू-कश्मीर में लगभग ३,८८८ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यात्रा श्रावण मास में होती है और रक्षाबंधन के दिन पूर्ण होती है। इस कथा का मुख्य सार 'त्याग की यात्रा' है, जहाँ ईश्वर को पाने के लिए सांसारिक मोह और अहंकार का त्याग अनिवार्य है।