
गणेश जन्म और गजमुख धारण करना
The Birth of Ganesha and How He Received the Elephant Head
कैलाश पर माता पार्वती का जीवन बाहर से तो पूर्ण था — परन्तु भीतर एक रिक्तता थी।
भगवान शिव प्रायः दीर्घ समाधि में लीन रहते, या गणों के साथ भ्रमण पर निकल जाते। उनके समस्त गण — नंदी, भृंगी, वीरभद्र — शिव जी के प्रति समर्पित थे। वे आज्ञा शिव की मानते थे, पार्वती की नहीं।
पार्वती जी को लगता था कि इस विशाल कैलाश में कोई एक भी ऐसा नहीं जो केवल मेरा हो।
एक दिन पार्वती जी स्नान करने के लिए भीतर गईं। उन्होंने नंदी को द्वार पर बिठाकर कहा — "किसी को भीतर मत आने देना।"
नंदी ने स्वीकार किया।
थोड़ी देर में शिव जी आ पहुँचे। नंदी ने एक क्षण भी नहीं रोका — वे तुरंत हट गए और शिव जी सीधे भीतर चले गए।
पार्वती जी को अत्यंत संकोच हुआ और साथ ही यह बोध भी — "नंदी का धर्म शिव के प्रति है, मेरे प्रति नहीं। मेरी आज्ञा का पालन करने वाला यहाँ कोई नहीं है। मुझे अपना एक गण चाहिए — जो केवल मेरा हो, जो मेरी आज्ञा को सर्वोपरि माने।"
एक दिन जब शिव जी कैलाश पर नहीं थे, पार्वती जी ने स्नान की तैयारी की।
उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन (हल्दी, चंदन और तेल का मिश्रण) को उतारा और उसे मलकर एक सुंदर बालक की आकृति बनाई।
फिर उन्होंने उसमें अपने योगबल से प्राण का संचार किया।
उसी क्षण एक अत्यंत तेजस्वी, सुंदर बालक जीवित होकर खड़ा हो गया। उसने माता के चरण छूकर कहा — "माता, आज्ञा दीजिए।"
पार्वती जी का हृदय भर आया। उन्होंने कहा — "पुत्र, तुम मेरे अपने हो — मेरे ही अंश से बने हो। आज तुम्हारा पहला कार्य यह है — मैं स्नान कर रही हूँ, तुम द्वार पर पहरा दो। मेरी आज्ञा के बिना किसी को भीतर मत आने देना — चाहे वह कोई भी हो।"
बालक ने एक हाथ में दंड लिया और द्वार पर खड़ा हो गया।
कुछ समय बाद भगवान शिव लौटे और भीतर जाने लगे।
बालक ने उन्हें रोक दिया — "रुकिए! माता स्नान कर रही हैं। उनकी आज्ञा है कि किसी को भीतर न आने दिया जाए।"
शिव जी चकित हुए। यह बालक कौन है? कैलाश पर तो ऐसा कोई नहीं था।
उन्होंने कहा — "बालक, तुम मुझे नहीं जानते। मैं इस घर का स्वामी हूँ। मार्ग छोड़ो।"
बालक बोला — "मैं आपको नहीं जानता और जानना भी नहीं चाहता। मैं केवल इतना जानता हूँ कि मेरी माता की आज्ञा है। जब तक मैं यहाँ खड़ा हूँ, कोई भीतर नहीं जाएगा।"
शिव जी ने अपने गणों को आदेश दिया — "इस बालक को हटाओ।"
नंदी, भृंगी और समस्त शिवगण आगे बढ़े। परन्तु आश्चर्य — वह बालक अकेला ही सबको परास्त करता गया।
फिर देवता आए — इन्द्र, वरुण, वायु, अग्नि — सब पराजित होकर लौट गए।
यहाँ तक कि कुछ पाठों के अनुसार कार्तिकेय भी उसे नहीं हरा सके।
कारण स्पष्ट था — उस बालक में स्वयं आदिशक्ति का बल था। वह पार्वती के ही अंश से बना था।
अब शिव जी का धैर्य टूटा।
यह अपमान का प्रश्न नहीं था — यह उनके लिए अकल्पनीय था कि उनके ही घर में उन्हें कोई रोके।
क्रोधित होकर उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया और उस बालक पर प्रहार किया।
एक ही वार में बालक का सिर धड़ से अलग होकर दूर जा गिरा। और कहा जाता है कि वह सिर इतनी दूर जा पड़ा कि कहीं खोजा न जा सका।
स्नान से बाहर आते ही पार्वती जी ने वह दृश्य देखा — उनका पुत्र भूमि पर, धड़ अलग, सिर विहीन।
उनके भीतर की करुणा उसी क्षण महाकाली में बदल गई।
उनका स्वरूप विकराल हो उठा। समस्त सृष्टि काँपने लगी। उन्होंने घोषणा की — "यदि मेरा पुत्र जीवित न हुआ, तो मैं इस समस्त ब्रह्मांड को इसी क्षण नष्ट कर दूँगी। न देवता बचेंगे, न लोक, न काल।"
उन्होंने अपनी शक्तियों को प्रकट करना आरंभ कर दिया और प्रलय के लक्षण दिखाई देने लगे।
देवता, ऋषि और स्वयं ब्रह्मा-विष्णु भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़े।
नारद जी और ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की — "माता, क्षमा कीजिए। जो हुआ अनजाने में हुआ। आप शांत हों, हम कोई उपाय निकालते हैं।"
पार्वती जी ने दो शर्तें रखीं — पहली — मेरा पुत्र पुनः जीवित होना चाहिए। दूसरी — उसे समस्त देवताओं में सर्वोच्च स्थान मिले। किसी भी पूजा, यज्ञ या शुभ कार्य में सर्वप्रथम उसी का पूजन हो। यदि ऐसा न हुआ, तो वह कार्य निष्फल रहे।
शिव जी ने, जो अब स्वयं भी पश्चात्ताप में थे, दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं।
शिव जी ने अपने गणों को आदेश दिया — "उत्तर दिशा में जाओ। मार्ग में जो भी प्राणी अपने शिशु की ओर पीठ करके सो रहा हो — अर्थात् जो अपने बच्चे की उपेक्षा कर रहा हो — उसका सिर काटकर ले आओ।"
(कुछ पाठों में यह आदेश इस प्रकार है — "जो भी प्राणी सबसे पहले मिले, उसका सिर ले आओ।")
गण उत्तर दिशा में गए। वहाँ उन्हें एक हाथी मिला, जो अपने बच्चे से मुँह फेरकर सो रहा था।
उन्होंने उस गजराज का सिर काटकर कैलाश ले आए।
(गजासुर वध की कथा से जोड़ने वाला भी एक पाठ प्रचलित है, जिसमें यह सिर गजासुर नामक दैत्य का था, जिसने वरदान माँगा था कि उसका शरीर शिव के काम आए।)
शिव जी ने वह हाथी का सिर बालक के धड़ पर स्थापित किया।
फिर उन्होंने अपनी योगशक्ति से उसमें प्राण फूँके।
बालक जीवित होकर उठ खड़ा हुआ — अब मानव देह और गज-मुख के साथ।
पार्वती जी ने उसे हृदय से लगा लिया। परन्तु एक क्षण के लिए वे दुःखी भी हुईं — "मेरा पुत्र इस रूप में? लोग उसका उपहास करेंगे।"
तब शिव जी ने कहा — "देवी, चिंता मत करो। यह रूप उपहास का नहीं, वंदना का विषय बनेगा।"
और समस्त देवताओं ने बारी-बारी से वरदान दिए — शिव जी — "यह मेरे समस्त गणों का अधिपति होगा। आज से इसका नाम गणपति और गणेश है। किसी भी कार्य, पूजा, यज्ञ या शुभ आरंभ में सर्वप्रथम इसी की पूजा होगी। जो ऐसा नहीं करेगा, उसका कार्य सिद्ध नहीं होगा।"
ब्रह्मा जी — "यह समस्त विद्याओं और बुद्धि का स्वामी होगा — बुद्धिप्रदाता।"
विष्णु जी — "यह समस्त विघ्नों का नाश करेगा — विघ्नहर्ता।"
इन्द्र — समृद्धि का वरदान।
लक्ष्मी जी — "जहाँ गणेश होंगे, वहाँ मैं रहूँगी।" (इसीलिए लक्ष्मी-गणेश साथ पूजे जाते हैं।)
सरस्वती जी — लेखनी और वाणी का वरदान।
गणेश जी का वाहन मूषक (चूहा) है, जो एक विशेष प्रतीक है।
कथा के अनुसार क्रौंच नामक एक गंधर्व ने ऋषि के श्राप से मूषक का रूप पाया और उपद्रव करने लगा। गणेश जी ने उसे वश में किया और अपना वाहन बना लिया।
प्रतीकात्मक अर्थ यह है — मूषक चंचल मन और लोभ का प्रतीक है, जो हर वस्तु को कुतरता रहता है। इतना विशाल शरीर इतने छोटे वाहन पर बैठा है — अर्थात् बुद्धि ने चंचल मन को अपने नियंत्रण में कर लिया है।
गणेश जी का एक नाम एकदंत है। इसके दो प्रसिद्ध कारण बताए जाते हैं — पहला — परशुराम जी शिव जी से मिलने आए। शिव जी विश्राम में थे, अतः गणेश जी ने उन्हें रोका। विवाद बढ़ा और परशुराम जी ने अपना परशु चलाया। गणेश जी जानते थे कि वह