
स्वयंप्रभा की गुफा
Swayamprabha Ki Gufa
दक्षिण दिशा में सीता की खोज करते हुए हनुमान जी, अंगद, जामवंत और उनके साथ के वानर भूख-प्यास से अत्यन्त व्याकुल हो गए। तपती धूप और सूखे वन में भटकते हुए उनका बल क्षीण होने लगा। तभी उन्होंने देखा कि एक स्थान पर से गीले पंखों वाले हंस, सारस और जल-पक्षी उड़कर निकल रहे हैं। बुद्धिमान हनुमान जी ने अनुमान लगाया कि आस-पास अवश्य ही जल का कोई स्रोत है। उन पक्षियों के आने की दिशा में चलते हुए वे एक विशाल, अंधकार से भरी गुफा के द्वार पर जा पहुँचे।
जल की आशा में सब वानर एक-दूसरे का हाथ थामकर उस गहरी, घोर अंधकारमय गुफा में प्रवेश कर गए। भीतर मार्ग बहुत लम्बा और भयानक था, चारों ओर घना अँधेरा था और कुछ भी दिखाई नहीं देता था। बहुत दूर तक चलते जाने पर सहसा उन्हें प्रकाश दिखाई देने लगा। और जब वे आगे बढ़े तो उनकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गईं — भीतर एक अलौकिक, स्वर्ग के समान सुन्दर उपवन था। वहाँ सोने-चाँदी के वृक्ष थे, रत्नजड़ित भवन थे, मीठे फलों से लदे बगीचे और स्वच्छ जल के सुन्दर सरोवर थे।
उस दिव्य स्थान में उन्होंने एक तपस्विनी को देखा, जो वल्कल-वस्त्र धारण किए, तप-तेज से दीप्त, अत्यन्त शांत मुद्रा में विराजमान थीं। वे स्वयंप्रभा नामक परम पवित्र सिद्ध योगिनी थीं। वानरों को भूख-प्यास से पीड़ित देखकर उन्होंने स्नेहपूर्वक उनका स्वागत किया, उनका परिचय पूछा और उन्हें मधुर फल तथा शीतल जल ग्रहण करने को कहा। थके हुए वानरों ने उनका आतिथ्य स्वीकार कर स्वयं को तृप्त किया और उनका बल पुनः लौट आया।
तब हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक स्वयंप्रभा को अपने आने का प्रयोजन बताया — कि वे श्रीराम की पत्नी सीता की खोज में इस गुफा में आ पहुँचे हैं और अब खोज की निर्धारित अवधि समाप्त होने के भय से चिंतित हैं। यह भी बताया कि इस चमत्कारी गुफा से बाहर निकलने का मार्ग उन्हें ज्ञात नहीं। स्वयंप्रभा ने उनकी सारी कथा सुनी और उनकी भक्ति तथा कर्तव्यनिष्ठा से अत्यन्त प्रसन्न हुईं।
स्वयंप्रभा ने कहा — "हे वानरो! इस मायामयी गुफा में जो एक बार प्रवेश कर जाता है, वह अपने बल से बाहर नहीं निकल सकता। परन्तु तुम श्रीराम के पवित्र कार्य में लगे हो, इसलिए मैं तुम्हारी सहायता करूँगी।" ऐसा कहकर उन्होंने सभी वानरों को नेत्र बन्द करने का आदेश दिया, और अपनी योग-शक्ति से क्षण भर में उन सबको गुफा के बाहर, समुद्र के तट के समीप पहुँचा दिया। तत्पश्चात् वे स्वयं तपस्या के लिए पुनः अपने स्थान को लौट गईं।
इस प्रसंग का भाव यही है कि जो जीव भगवान के कार्य में सच्चे मन से लगा रहता है, संसार-रूपी अंधकारमय गुफा में भटकते समय भी उसे सिद्ध-संतों की कृपा और मार्गदर्शन अनायास मिल जाता है। स्वयंप्रभा जैसी तपस्विनी की कृपा उन्हीं पर बरसती है जिनके हृदय में प्रभु-सेवा की निष्ठा हो।