
सीता की खोज में दक्षिण दिशा जाना
Sita Ki Khoj Mein Dakshin Disha Jana
बालि-वध के पश्चात् सुग्रीव किष्किंधा के राजा बने और अंगद को युवराज बनाया गया। किन्तु राज्य-सुख और वैभव पाकर सुग्रीव कुछ काल के लिए श्रीराम को दिया अपना वचन भूल-से गए। वर्षा ऋतु बीत गई, शरद ऋतु आ गई, फिर भी सीता की खोज आरम्भ नहीं हुई। तब लक्ष्मण जी के स्मरण दिलाने पर सुग्रीव को अपना कर्तव्य याद आया, और उन्होंने तत्काल चारों दिशाओं में असंख्य वानर-सेनाएँ सीता माता की खोज के लिए भेजने का आदेश दिया।
सुग्रीव ने अत्यन्त विचारपूर्वक टोलियाँ बनाईं और प्रत्येक दिशा में योग्य सेनापति नियुक्त किए। किन्तु उनके हृदय में सबसे अधिक विश्वास दक्षिण दिशा की टोली पर था, क्योंकि उन्हें आशा थी कि सीता का पता वहीं मिलेगा। इसीलिए उन्होंने इस मुख्य दल का नेतृत्व वृद्ध, अनुभवी और परम बुद्धिमान ऋक्षराज जामवंत, युवराज अंगद तथा महाबली हनुमान जी को सौंपा। यही वह दल था जिस पर श्रीराम की सारी आशाएँ टिकी थीं।
प्रस्थान से पूर्व श्रीराम ने हनुमान जी को अपने पास बुलाया। उन्हें अन्तर्यामी प्रभु जानते थे कि यह महान कार्य हनुमान जी के ही हाथों सिद्ध होगा। उन्होंने अपनी अँगुली से अपनी नाम-अंकित मुद्रिका उतारकर हनुमान जी को दी और कहा — "हे पवनपुत्र! जब तुम सीता से भेंट करो, तो यह अँगूठी उन्हें देना। इस पहचान-चिह्न से वे तुम पर विश्वास करेंगी।" यह मुद्रिका पाकर हनुमान जी ने उसे मस्तक से लगाया, और उनका हृदय स्वामी के इस विश्वास से भर उठा।
दक्षिण की ओर बढ़ता हुआ यह वानर-दल घने वनों, ऊँचे पर्वतों, गहरी घाटियों और भयानक निर्जन प्रदेशों को पार करता गया। मार्ग में उन्हें अनेक कष्ट सहने पड़े — भूख, प्यास और थकान ने उन्हें घेर लिया। परन्तु श्रीराम के कार्य की धुन में डूबे हुए वे सब बाधाओं को पार करते चले गए। हनुमान जी सबका उत्साह बढ़ाते, थके हुए वानरों को सांत्वना देते और सबको श्रीराम की महिमा का स्मरण कराते हुए आगे मार्गदर्शन करते रहे।
बहुत खोजने पर भी जब सीता माता का कोई सुराग न मिला, तो एक भयंकर, अंधकारमय गुफा उनके सामने आई। सुग्रीव ने खोज के लिए केवल एक मास की अवधि निर्धारित की थी, और वह अवधि लगभग समाप्त हो रही थी। इससे वानरों के मन में निराशा और मृत्यु का भय व्याप्त होने लगा। फिर भी अपने प्रभु के प्रति कर्तव्य-भावना से बँधे हुए वे उस अनजान गुफा में प्रवेश करने का साहस जुटाने लगे।
इस प्रसंग का भाव यही है कि प्रभु का कार्य सदा सरल नहीं होता; उसमें अनेक विघ्न, थकान और निराशा आती है। परन्तु जो भक्त श्रीराम की मुद्रिका अपने हृदय में सँजोकर, अटूट श्रद्धा से आगे बढ़ता रहता है, उसके लिए मार्ग स्वयं खुलता चला जाता है। हनुमान जी वही आदर्श सेवक हैं, जो प्रभु के विश्वास को अपना परम धन मानकर हर बाधा से जूझते हैं।