
राम-लक्ष्मण से प्रथम भेंट (ब्राह्मण वेश में)
Ram-Lakshman Se Pratham Bhent
सीता माता के हरण के पश्चात् श्रीराम और लक्ष्मण उनकी खोज में वन-वन भटकते हुए ऋष्यमूक पर्वत के समीप आ पहुँचे। दोनों भाई थके हुए, किन्तु धैर्यवान थे। उनके मुख पर विषाद की छाया अवश्य थी, परन्तु नेत्रों में तेज और मर्यादा का प्रकाश यथावत् दीप्त था। धनुष-बाण धारण किए हुए वे दो तेजस्वी वीर पर्वत की ओर बढ़ते चले आ रहे थे।
उसी पर्वत पर वानरराज सुग्रीव अपने कुछ विश्वस्त मंत्रियों के साथ बालि के भय से छिपे हुए दिन बिता रहे थे। जब उन्होंने दो अपरिचित धनुर्धारियों को अपनी ओर आते देखा, तो उनका हृदय शंका से भर उठा। उन्हें लगा कि कहीं ये बालि के भेजे हुए दूत न हों, जो उन्हें मारने आए हों। भयभीत सुग्रीव ने तुरन्त हनुमान जी को बुलाकर आदेश दिया — "हे पवनपुत्र! तुम बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हो। इन दोनों वीरों के पास जाकर उनका परिचय और मंतव्य जानो कि ये कौन हैं और यहाँ किस प्रयोजन से आए हैं।"
स्वामी की आज्ञा शिरोधार्य कर हनुमान जी ने विनम्र ब्राह्मण का वेश धारण किया। वे जानते थे कि अपरिचित के समक्ष कैसे जाना चाहिए। ब्राह्मण-रूप में वे मधुर, नम्र और शुद्ध वाणी बोलते हुए राम-लक्ष्मण के सम्मुख उपस्थित हुए। उनकी वाणी में ऐसी मिठास, ऐसी शिष्टता और ऐसा शास्त्र-सम्मत विनय था कि सुनते ही श्रीराम मुग्ध हो गए।
हनुमान जी ने कहा — "हे राजर्षियों के समान तेजस्वी वीरो! आप कौन हैं? आपके शरीर पर तो राजोचित लक्षण हैं, फिर भी आप तपस्वियों के समान वल्कल वस्त्र धारण किए इस निर्जन वन में क्यों विचरण कर रहे हैं? आपके नेत्रों में करुणा है और भुजाओं में असीम बल। आप देवता हैं, गंधर्व हैं अथवा नर-श्रेष्ठ, कृपया अपना परिचय दें।" इतनी सुन्दर, अलंकृत और व्याकरण-शुद्ध वाणी सुनकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा — "हे भाई! जिसने ऐसी परिष्कृत वाणी सीखी है, वह अवश्य ही ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का पूर्ण ज्ञाता है। इसकी वाणी में एक भी दोष नहीं। ऐसा दूत जिस राजा के पास हो, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।"
तब लक्ष्मण जी ने परिचय दिया कि ये अयोध्यानरेश दशरथ के पुत्र श्रीराम हैं, जो पिता की आज्ञा से वनवास में हैं और जिनकी धर्मपत्नी सीता का किसी राक्षस ने हरण कर लिया है। वे सुग्रीव नामक वानरराज से मित्रता की खोज में यहाँ आए हैं। यह सुनते ही हनुमान जी का हृदय भाव-विभोर हो उठा। उन्होंने पहचान लिया कि ये तो साक्षात् परब्रह्म, मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीराम हैं जिनके दर्शन के लिए योगी युगों तपस्या करते हैं।
अपार भक्ति से पूर्ण हनुमान जी अपना ब्राह्मण-वेश त्यागकर अपने वास्तविक वानर-रूप में प्रकट हुए और श्रीराम के चरणों में दंडवत् लोट गए। नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। श्रीराम ने भी उठकर उन्हें प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया। यह वह पावन क्षण था जब सेवक और स्वामी, भक्त और भगवान का सनातन मिलन हुआ। इस प्रथम भेंट का भाव यही है कि विनम्रता, विवेक और शुद्ध वाणी से ही सच्चा सेवक अपने प्रभु को पहचानता है और उन्हें अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है।