Bali Vadh Ka Prasang

बालि वध का प्रसंग

Bali Vadh Ka Prasang

श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता स्थिर होने के पश्चात् सुग्रीव ने अपने ऊपर हुए अन्याय की कथा श्रीराम को विस्तार से सुनाई। उन्होंने बताया कि किस प्रकार बालि नामक असुर मायावी के साथ युद्ध करते हुए बालि एक गुफा में प्रविष्ट हुए और लम्बे समय तक बाहर नहीं आए। भीतर से रक्त की धारा बहती देख सुग्रीव ने यह समझ लिया कि उनके भाई मारे गए, और वे गुफा-द्वार पर शिला रखकर किष्किंधा लौट आए। किन्तु बालि जीवित लौट आए, उन्होंने सुग्रीव को अपराधी समझ लिया और उन्हें राज्य से निकालकर उनकी पत्नी तक छीन ली।

श्रीराम ने सुग्रीव के दुःख को समझा और अधर्मी बालि के दमन का वचन दिया। किन्तु सुग्रीव के मन में बालि के अपार बल को लेकर संदेह था। उनका विश्वास दृढ़ करने के लिए श्रीराम ने दुन्दुभि नामक राक्षस के विशाल अस्थि-पंजर को अपने पैर के अँगूठे मात्र से बहुत दूर उछाल दिया, और एक ही बाण से सात विशाल ताड़-वृक्षों को आर-पार बेध डाला। यह अद्भुत पराक्रम देखकर सुग्रीव का सारा संशय जाता रहा और उनका हृदय आत्मविश्वास से भर उठा।

तब योजनानुसार सुग्रीव किष्किंधा जाकर बालि को युद्ध के लिए ललकारने लगे। क्रोधित बालि तुरन्त बाहर निकल आए और दोनों भाइयों में घोर मल्लयुद्ध होने लगा। किन्तु दोनों का रूप और आकृति इतनी समान थी कि श्रीराम वृक्ष की ओट में छिपे रहकर भी यह निश्चय नहीं कर पाए कि कौन बालि है और कौन सुग्रीव। इसी संशय के कारण उन्होंने बाण नहीं चलाया, और बालि से बुरी तरह पिटकर सुग्रीव प्राण बचाकर पर्वत की ओर भाग आए।

श्रीराम ने अपने मित्र को आश्वस्त किया कि इस बार वे भूल नहीं करेंगे और एक पहचान-चिह्न की व्यवस्था की। हनुमान जी ने सुग्रीव के गले में गजपुष्पी की एक सुन्दर लता-माला पहना दी, जिससे दोनों भाई सुगमता से पहचाने जा सकें। पुनः सुग्रीव ने बालि को ललकारा, और फिर वही भीषण द्वन्द्व आरम्भ हुआ। इस बार श्रीराम ने ठीक पहचानकर अपने अमोघ बाण से बालि की छाती बेध दी। परम बलशाली बालि धराशायी हो गए।

गिरते हुए बालि ने श्रीराम पर छिपकर प्रहार करने का उलाहना दिया। तब श्रीराम ने उन्हें धर्म का मर्म समझाया — बालि ने अपने छोटे भाई की पत्नी को, जो पुत्रीवत् थी, बलपूर्वक अपने पास रखा था, यह घोर अधर्म था; और राजा दंडधारी के रूप में मर्यादा-रक्षा हेतु अधर्मी को दंड देना धर्म ही है। श्रीराम के वचनों से बालि का मन निर्मल हो गया, उनका सारा क्रोध और अभिमान शांत हो गया। उन्होंने अपने पुत्र अंगद को श्रीराम के चरणों में सौंप दिया और प्रभु का दर्शन पाकर वे धन्य होकर देह त्याग गए।

इस प्रसंग का भाव यही है कि भगवान अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए ही अवतार लेते हैं। जो अंत समय में भी प्रभु का स्मरण और दर्शन पा लेता है, उसका उद्धार निश्चित है — अभिमानी बालि भी श्रीराम के हाथों मुक्त होकर परम गति को प्राप्त हुआ।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Ram-Lakshman Se Pratham Bhent

राम-लक्ष्मण से प्रथम भेंट (ब्राह्मण वेश में)

Ramayan Kishkindha Kaal
Sugriv Aur Ram Ki Mitrata Karana

सुग्रीव और राम की मित्रता कराना

Ramayan Kishkindha Kaal
Sita Ki Khoj Mein Dakshin Disha Jana

सीता की खोज में दक्षिण दिशा जाना

Ramayan Kishkindha Kaal
Swayamprabha Ki Gufa

स्वयंप्रभा की गुफा

Ramayan Kishkindha Kaal
Sampati Se Lanka Ka Pata Chalna

संपाति से लंका का पता चलना

Ramayan Kishkindha Kaal
Jamvant Dwara Shakti Smaran Karana

जामवंत द्वारा शक्ति स्मरण कराना

Ramayan Kishkindha Kaal