
जामवंत द्वारा शक्ति स्मरण कराना
Jamvant Dwara Shakti Smaran Karana
संपाति के मुख से यह जानकर कि सीता माता सौ योजन दूर समुद्र के उस पार लंका में बंदी हैं, वानरों का दल हर्षित तो हुआ, किन्तु शीघ्र ही एक विकट समस्या उनके सामने आ खड़ी हुई। लहराता हुआ अथाह, भयंकर समुद्र उनके और लंका के बीच में था। इतने विशाल सागर को लाँघकर उस पार जाना कोई साधारण कार्य नहीं था। सब वानर परस्पर पूछने लगे कि इनमें से कौन ऐसा है जो सौ योजन का यह समुद्र फाँदकर पार जा सके।
एक-एक करके वानरों ने अपने-अपने बल का आकलन किया। किसी ने कहा वह दस योजन जा सकता है, किसी ने बीस, किसी ने तीस, किसी ने पचास योजन। अनुभवी और वृद्ध जामवंत ने कहा कि यद्यपि उनमें कभी अपार बल था, परन्तु अब वृद्धावस्था के कारण वे इतनी दूर नहीं जा सकते। तब युवराज अंगद ने कहा कि वे सौ योजन जाने की सामर्थ्य तो रखते हैं, परन्तु वहाँ से लौटकर आने की शक्ति उनमें रहेगी या नहीं, इसका उन्हें विश्वास नहीं। इस प्रकार सब निराश होकर मौन बैठ गए, और प्रभु का कार्य अधूरा रहता हुआ प्रतीत होने लगा।
इस समस्त वार्तालाप के समय हनुमान जी सबसे अलग, चुपचाप, विनम्र भाव से बैठे हुए थे। अपने अपार बल का उन्हें तनिक भी अभिमान नहीं था, अतः वे अपनी सामर्थ्य के विषय में मौन थे। बुद्धिमान जामवंत की दृष्टि उन पर पड़ी। वे भली-भाँति जानते थे कि इस समस्त वानर-दल में केवल एक ही ऐसा वीर है जो यह असंभव कार्य कर सकता है — और वह हैं पवनपुत्र हनुमान। जामवंत ने अनुभव किया कि हनुमान जी अपनी शक्ति को स्वयं विस्मृत किए बैठे हैं, और अब उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण कराना ही एकमात्र उपाय है।
जामवंत जी हनुमान जी के पास आकर प्रेम और उत्साह से भरे वचन बोले — "हे पवनपुत्र! तुम मौन क्यों बैठे हो? तुम तो साक्षात् वायुदेव के पुत्र हो, बल-बुद्धि और तेज में तुम्हारे समान कोई नहीं। तुम्हारा जन्म ही महान कार्यों के लिए हुआ है।" इसके पश्चात् उन्होंने हनुमान जी को उनके बचपन की वह लीला स्मरण कराई, जब उन्होंने उदय होते हुए सूर्य को फल समझकर निगलने के लिए आकाश में छलाँग लगाई थी। उन्होंने कहा — "जो तुमने बालपन में सूर्यमंडल तक छलाँग लगाई थी, उसके सामने यह सौ योजन का समुद्र क्या है? तुम्हीं इस कार्य के लिए जन्मे हो, तुम्हीं श्रीराम की कीर्ति के धारक हो।"
जामवंत के इन प्रेरणादायी वचनों को सुनते ही हनुमान जी के भीतर सोई हुई शक्ति मानो जाग उठी। उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप और बल का स्मरण हो आया। उनका शरीर बढ़ने लगा, उनका तेज सूर्य के समान प्रकाशमान हो उठा, और उनका पराक्रम असीम रूप में प्रकट हो गया। श्रीराम का नाम हृदय में धारण कर, गर्जना करते हुए उन्होंने घोषणा की कि वे अवश्य ही समुद्र लाँघकर लंका जाएँगे, सीता माता के दर्शन करेंगे और उन्हें श्रीराम का संदेश देकर लौट आएँगे। समस्त वानर-दल का हृदय हर्ष और उत्साह से भर उठा।
इस प्रसंग का भाव अत्यन्त गहन है — प्रत्येक जीव के भीतर असीम शक्ति विद्यमान है, किन्तु प्रायः वह उसे भूला रहता है। संत-गुरु रूपी जामवंत जब उस भूली हुई शक्ति का स्मरण करा देते हैं, तब भक्त हनुमान बनकर असंभव को भी संभव कर दिखाता है। सच्चा बल विनम्रता, प्रभु-भक्ति और आत्म-स्मरण से ही जागृत होता है।