Sampati Se Lanka Ka Pata Chalna

संपाति से लंका का पता चलना

Sampati Se Lanka Ka Pata Chalna

स्वयंप्रभा की कृपा से गुफा के बाहर समुद्र-तट पर पहुँचे हुए वानर अत्यन्त निराश थे। सीता की खोज की निर्धारित अवधि पूरी हो चुकी थी और अब भी उन्हें माता का कोई सुराग नहीं मिला था। असफल होकर सुग्रीव के सामने लौटने का अर्थ था मृत्यु का दंड। इसी विषाद में डूबे हुए अंगद और अन्य वानरों ने निश्चय किया कि अब वे यहीं प्रायोपवेशन करेंगे अर्थात् अन्न-जल त्यागकर प्राण दे देंगे। दुःखी होकर वे कुश-आसन बिछाकर तट पर बैठ गए और श्रीराम, दशरथ तथा सीता की कथा परस्पर कहने लगे।

उसी पर्वत की चोटी पर संपाति नामक एक विशालकाय, वृद्ध गिद्ध रहता था। वह जटायु का बड़ा भाई था। बहुत समय पूर्व जब दोनों भाई सूर्य के समीप तक उड़ गए थे, तब तपते सूर्य से छोटे भाई जटायु की रक्षा करने के लिए संपाति ने अपने पंख फैलाए थे; उस भयंकर ताप से उसके दोनों पंख जल गए और वह पंखहीन होकर उसी पर्वत पर पड़ा हुआ अपने दिन बिता रहा था। भूख से पीड़ित संपाति ने जब नीचे इतने सारे वानरों को एकत्र देखा, तो उसे प्रसन्नता हुई कि आज उसे स्वयं ही भोजन प्राप्त हो जाएगा।

नीचे बैठे वानरों की बातें सुनते-सुनते संपाति के कानों में अपने प्रिय भाई जटायु का नाम पड़ा। वह चौंक उठा और बड़ी कठिनाई से पर्वत से नीचे उतरकर वानरों के पास आया। उसे देखकर वानर पहले भयभीत हुए, किन्तु संपाति ने स्नेहपूर्वक अपने भाई जटायु का समाचार पूछा। तब वानरों ने बताया कि किस प्रकार वीर जटायु ने सीता-हरण के समय रावण से युद्ध किया और श्रीराम के कार्य में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। अपने छोटे भाई के वीरगति पाने का समाचार सुनकर संपाति की आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

तत्पश्चात् संपाति ने वानरों से उनके शोक का कारण पूछा और उनके प्रति सहायता का भाव प्रकट किया। जब उसे ज्ञात हुआ कि ये सब श्रीराम की पत्नी सीता की खोज में हैं और निराश होकर प्राण त्यागने बैठे हैं, तो उसने उन्हें आश्वासन दिया। संपाति ने अपनी विशेष दूर तक देख सकने वाली गिद्ध-दृष्टि से बताया — "हे वानरो! इसी समुद्र के उस पार, सौ योजन दूर, त्रिकूट पर्वत पर रावण की स्वर्णमयी नगरी लंका बसी है। मैंने अपनी दृष्टि से देखा है कि रावण सीता को उठा ले गया है और उन्हें अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा है। सीता अभी जीवित हैं और श्रीराम का स्मरण करती हुई विलाप कर रही हैं।"

संपाति के इन वचनों से मुरझाए हुए वानरों में मानो नवजीवन का संचार हो गया। जिस सीता की खोज में वे व्याकुल थे, उनका ठिकाना अब निश्चित हो चुका था। आश्चर्य की बात यह हुई कि श्रीराम के कार्य में इस प्रकार सहायता करने के फलस्वरूप और अपने भाई की स्मृति में सत्य-वचन बोलने के पुण्य से संपाति के जले हुए पंख उसी क्षण पुनः उग आए। वह प्रसन्न होकर आकाश में उड़ गया, मानो प्रभु ने उसकी सेवा का पुरस्कार तत्काल दे दिया हो।

इस प्रसंग का भाव यही है कि प्रभु के कार्य में की गई कोई भी सहायता कभी व्यर्थ नहीं जाती। जिसने जटायु के समान प्रभु-हित में प्राण दिए, वह अमर हुआ; और संपाति के समान जिसने सच्ची राह दिखाई, उसके जीवन के अभिशाप भी वरदान में बदल गए। श्रीराम की सेवा ही सबसे बड़ा उद्धार है।

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