
सूर्य को गुरु बनाना और चलते-चलते शिक्षा लेना
Surya Ko Guru Banana Aur Chalte-Chalte Shiksha Lena
जैसे-जैसे बालक हनुमान बड़े होते गए, उनके भीतर ज्ञान की तीव्र पिपासा जागृत हुई। वे केवल बलशाली ही नहीं, अपितु महाज्ञानी और शास्त्रों के पारंगत भी बनना चाहते थे। उन्होंने विचार किया कि समस्त विद्याओं और वेद-वेदांगों का ज्ञान जिससे प्राप्त हो सकता है, ऐसा सर्वश्रेष्ठ गुरु कौन है। उनका मन भगवान सूर्य की ओर गया, जो समस्त विद्याओं के स्वामी और ज्ञान के अखंड स्रोत माने जाते हैं।
हनुमान जी आकाश में जाकर भगवान सूर्य के समक्ष उपस्थित हुए और हाथ जोड़कर विनम्र भाव से प्रार्थना की — "हे सूर्यदेव! आप समस्त विद्याओं के भंडार हैं। कृपया मुझे अपना शिष्य स्वीकार कर वेद-वेदांगों और सभी शास्त्रों का ज्ञान प्रदान कीजिए।" सूर्यदेव ने बालक की जिज्ञासा और भक्ति देखकर प्रसन्नता तो अनुभव की, परंतु एक कठिनाई बताई।
सूर्यदेव बोले — "हे वत्स! तुम्हारी विद्या-पिपासा अत्यंत श्रेष्ठ है, किंतु मैं तो एक क्षण भी विश्राम नहीं करता। मुझे निरंतर अपने रथ पर सवार होकर आकाश में भ्रमण करना पड़ता है, ताकि सृष्टि में दिन-रात का क्रम बना रहे। ऐसे में एक स्थान पर बैठकर तुम्हें शिक्षा देना मेरे लिए संभव नहीं है।"
यह सुनकर हनुमान जी तनिक भी विचलित न हुए। उन्होंने तत्काल एक अद्भुत उपाय निकाला। उन्होंने कहा — "हे गुरुदेव! यदि आप एक स्थान पर रुक नहीं सकते, तो मैं आपके रथ के आगे-आगे, आकाश में उलटा मुख करके चलूँगा, ताकि सदैव आपके सम्मुख बना रहूँ और आपकी शिक्षा ग्रहण करता रहूँ।" सूर्यदेव उनकी इस लगन, बुद्धि और समर्पण से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार कर लिया।
फिर आरंभ हुई एक अनोखी गुरु-शिष्य परंपरा। भगवान सूर्य अपने रथ पर पूर्व से पश्चिम की ओर निरंतर चलते रहते, और हनुमान जी उनके आगे-आगे, उलटे मुख से चलते हुए, प्रचंड ताप और तीव्र गति की परवाह किए बिना एकाग्रचित्त होकर विद्या ग्रहण करते रहते। ऐसी विषम और कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने अल्प समय में ही समस्त वेद, उपनिषद, व्याकरण, नीतिशास्त्र और अन्य विद्याओं में असाधारण निपुणता प्राप्त कर ली।
हनुमान जी की यह लगन देखकर सूर्यदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को समस्त विद्याओं का पूर्ण ज्ञान प्रदान किया। इस प्रकार हनुमान जी न केवल बल में, अपितु बुद्धि, ज्ञान और वाक्-चातुर्य में भी सर्वश्रेष्ठ बन गए। यही कारण है कि आगे चलकर वे "बुद्धिमतां वरिष्ठम्" अर्थात बुद्धिमानों में श्रेष्ठ कहलाए।
सूर्य को गुरु बनाने की यह कथा हमें यह भाव देती है कि सच्चे शिष्य के लिए कोई कठिनाई बाधा नहीं बनती — विनम्रता, लगन और समर्पण से किसी भी परिस्थिति में ज्ञान अर्जित किया जा सकता है।