
शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाना
Shantidoot Bankar Hastinapur Jaana
तेरह वर्ष का वनवास और अज्ञातवास पूर्ण करके जब पांडव लौटे, तो उन्होंने संधि की शर्त के अनुसार अपना आधा राज्य वापस माँगा। किंतु दुर्योधन अपने अहंकार में इतना अंधा हो चुका था कि उसने बिना युद्ध के सुई की नोक बराबर भूमि भी देने से इनकार कर दिया। दोनों ओर विशाल सेनाएँ एकत्र होने लगीं और महाभयंकर युद्ध की काली छाया मंडराने लगी।
ऐसे संकट के समय, अनगिनत निर्दोष प्राणों की रक्षा हेतु, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाने का निर्णय लिया। यद्यपि वे जानते थे कि दुर्योधन का हृदय पत्थर हो चुका है, फिर भी शांति का अंतिम प्रयास करना उन्होंने अपना धर्म समझा, ताकि संसार यह जान ले कि पांडवों ने और स्वयं भगवान ने युद्ध टालने की भरपूर चेष्टा की थी।
श्रीकृष्ण जब रथ पर सवार होकर हस्तिनापुर की ओर चले, तो मार्ग में अनेक शुभ शकुन हुए। हस्तिनापुर पहुँचने पर भीष्म, द्रोण, विदुर और अनेक सज्जनों ने उनका हार्दिक स्वागत किया। श्रीकृष्ण ने विदुर के घर विश्राम किया, क्योंकि विदुर धर्मात्मा और भगवान के अनन्य भक्त थे।
अगले दिन भरे राजदरबार में श्रीकृष्ण ने अत्यंत मधुर, गंभीर और न्यायपूर्ण वाणी में सभी को समझाया। उन्होंने कहा कि पांडव मात्र पाँच गाँव लेकर संतुष्ट हो जाएँगे और युद्ध टल जाएगा। उन्होंने कौरवों को कुल के विनाश, अनगिनत माताओं के वैधव्य और धर्म की हानि का भय दिखाकर सन्मार्ग पर लौटने की प्रार्थना की। भीष्म, द्रोण और विदुर ने भी दुर्योधन को समझाया।
किंतु दुर्योधन ने न केवल यह प्रस्ताव ठुकरा दिया, अपितु दुष्ट-बुद्धि से भगवान श्रीकृष्ण को ही बंदी बनाने का दुस्साहसपूर्ण षड्यंत्र रच डाला। यह अधर्म की पराकाष्ठा थी — कि जो साक्षात् जगत के स्वामी हैं, उन्हें ही बाँधने का दुःसाहस किया जाए। श्रीकृष्ण ने इस अधर्म को उजागर करने का निश्चय किया।
इस लीला का भाव यही है कि भगवान सदैव शांति, क्षमा और सन्मार्ग की ओर ले जाना चाहते हैं। युद्ध और विनाश उनकी अंतिम पसंद है, प्रथम नहीं। जो अहंकारवश बार-बार दी गई क्षमा और शांति के अवसरों को ठुकरा देता है, वही अंततः अपने विनाश का कारण बनता है।