
द्रौपदी चीरहरण और लाज रक्षा
Draupadi Cheerharan aur Laaj Raksha
हस्तिनापुर के राजदरबार में उस दिन अधर्म अपने चरम पर था। दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि के छल-कपट से भरे पासों की सहायता से जुए में युधिष्ठिर से उनका सारा राज्य, धन, भाई और स्वयं युधिष्ठिर को भी जीत लिया। अंत में शकुनि ने युधिष्ठिर को उकसाकर पांडवों की धर्मपत्नी द्रौपदी को भी दाँव पर लगवा दिया, और छल से वह दाँव भी हार गए। धर्मराज युधिष्ठिर का सिर लज्जा से झुक गया, किंतु अधर्म के मद में चूर कौरव हर्ष से भर उठे।
दुर्योधन ने दुःशासन को आज्ञा दी कि द्रौपदी को केश पकड़कर भरे दरबार में घसीट लाए। दुःशासन ने वैसा ही किया। रजस्वला अवस्था में, एक ही वस्त्र में लिपटी पांचाली को जब सभा में लाया गया, तो उसने काँपते स्वर में सभी वृद्धजनों — भीष्म, द्रोण, विदुर — से न्याय की पुकार लगाई। किंतु सब मौन रहे, क्योंकि वे राजा के अन्न के बंधन में बँधे थे। महारानी द्रौपदी की आँखों से आँसुओं की धारा बह चली।
तब दुर्योधन ने अपनी जाँघ ठोककर द्रौपदी का अपमान किया और दुःशासन को उसका चीर खींचने की आज्ञा दे दी। दुःशासन ने अट्टहास करते हुए द्रौपदी की साड़ी का छोर पकड़कर खींचना आरंभ किया। द्रौपदी ने भीष्म-द्रोण की ओर देखा, अपने पतियों की ओर देखा — किंतु सब बँधे-बँधे लाचार थे। तब उस असहाय क्षण में पांचाली ने अपने दोनों हाथ छोड़ दिए और आकाश की ओर उठाकर आर्त पुकार लगाई — "हे द्वारकानाथ! हे गोविंद! हे केशव! अब मेरी लाज तुम्हारे ही हाथ है।"
द्वारका में विराजमान भक्तवत्सल श्रीकृष्ण ने अपनी अनन्य भक्त की पुकार सुन ली। कहते हैं कि जैसे ही द्रौपदी ने सारा भार प्रभु पर छोड़ दिया, वैसे ही अदृश्य रूप से भगवान वहाँ प्रकट हो गए। दुःशासन ज्यों-ज्यों वस्त्र खींचता, त्यों-त्यों द्रौपदी के तन पर नया वस्त्र आता गया। एक साड़ी के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी — रंग-बिरंगे वस्त्रों का अंबार सभा में लगता चला गया।
दुःशासन खींचते-खींचते थककर चूर हो गया, उसका बल क्षीण हो गया, पर वस्त्रों का अंत न आया। सारा दरबार यह अलौकिक चमत्कार देखकर स्तब्ध रह गया। अधर्मियों के मुख पर हार का अंधकार छा गया, और भक्तों के हृदय भगवान की करुणा से भर उठे। पांचाली की लाज पूर्ण रूप से सुरक्षित रही, क्योंकि उसकी रक्षा का भार साक्षात् त्रिलोकीनाथ ने उठा लिया था।
इस लीला का भाव यही है कि जब भक्त अपना सारा अहंकार, सारी चिंता और सारा भार निःशेष होकर प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है, तब भगवान स्वयं दौड़े चले आते हैं और उसकी लाज की रक्षा करते हैं। द्रौपदी की पुकार आज भी हर विपत्ति में यही सिखाती है — "गोविंद, अब सब कुछ तुम्हारा है।"