
दरबार में विराट रूप दर्शन
Darbaar Mein Viraat Roop Darshan
शांति का अंतिम प्रस्ताव लेकर भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर के भरे दरबार में उपस्थित थे। उन्होंने अत्यंत मधुर और न्यायपूर्ण वाणी में सभी को समझाया कि युद्ध से कुल का विनाश होगा, अनगिनत निर्दोष मारे जाएँगे, और धर्म की हानि होगी। किंतु अभिमान के मद में चूर दुर्योधन को यह सारी बातें व्यर्थ लगीं।
अपने अहंकार की सीमा पार करते हुए दुर्योधन ने एक भयंकर दुष्ट योजना बना ली। उसने सोचा कि यदि वह श्रीकृष्ण को ही बंदी बना ले, तो पांडव नेतृत्वहीन होकर स्वयं झुक जाएँगे। उसने अपने सैनिकों को संकेत कर दिया कि भरे दरबार में भगवान को रस्सियों से बाँधकर बंदी बना लिया जाए। यह अधर्म की पराकाष्ठा थी।
जब भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन की यह कुटिल मंशा भाँप ली, तो उन्होंने संसार को अधर्म का परिणाम और अपनी वास्तविक महिमा दिखाने का निश्चय किया। उन्होंने गंभीर वाणी में कहा — "दुर्योधन, तू मुझे अकेला और असहाय समझकर बाँधना चाहता है? तो देख, मैं कौन हूँ!" और यह कहते ही उन्होंने अपना अलौकिक विराट रूप प्रकट कर दिया।
देखते ही देखते भगवान का शरीर आकाश को छूने लगा। उनके अंग-अंग में समस्त देवता प्रकट हो गए। उनके ललाट पर ब्रह्मा, हृदय में समस्त लोक, भुजाओं में इंद्रादि देवगण और मुख से अग्नि की ज्वालाएँ निकलने लगीं। उनके अनगिनत मुख, अनगिनत नेत्र और अनगिनत भुजाएँ प्रकट हो गईं। सूर्य और चंद्रमा उनके नेत्र बन गए और सारा दरबार उस दिव्य तेज से जगमगा उठा।
इस अलौकिक विराट रूप को देखकर सारा कौरव दरबार भय और विस्मय से काँप उठा। दुर्योधन और उसके साथी अपनी आँखें भी न खोल सके। किंतु धन्यभागी भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, विदुर और संजय — इन जैसे पुण्यात्माओं को भगवान ने दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे वे इस अद्भुत रूप के दर्शन कर धन्य हो गए और उनके नेत्र सफल हो गए।
कुछ ही क्षणों में भगवान ने अपना वह विराट रूप समेट लिया और पुनः सौम्य मानव रूप में प्रकट हो गए। यह लीला दिखाकर वे शांति का अंतिम प्रयास विफल जानकर दरबार से लौट गए, किंतु संसार को यह चेतावनी दे गए कि जिसे वे अकेला समझ रहे हैं, वही समस्त सृष्टि का स्वामी है।
इस लीला का भाव यही है कि भगवान किसी बंधन में नहीं बाँधे जा सकते, अपितु समस्त ब्रह्मांड उन्हीं में समाया है। जो अहंकारी उन्हें साधारण मनुष्य समझकर उनका अनादर करता है, वह अपने ही विनाश को न्योता देता है। भक्त-हृदय ही उनके इस दिव्य रूप का सच्चा दर्शन पा सकता है।