
अर्जुन के सारथी बनना
Arjun ke Saarathi Banna
जब महाभारत का युद्ध अवश्यंभावी हो गया, तब दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही श्रीकृष्ण की सहायता माँगने द्वारका पहुँचे। भगवान उस समय शयन कर रहे थे। दुर्योधन आकर अभिमानपूर्वक उनके सिरहाने बैठ गया, जबकि विनम्र अर्जुन उनके चरणों की ओर हाथ जोड़कर खड़े रहे। जब भगवान जागे, तो उनकी दृष्टि सबसे पहले चरणों में खड़े अर्जुन पर पड़ी।
भगवान ने दोनों को एक अनोखा प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा — "एक ओर मैं अकेला हूँ, किंतु युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊँगा; और दूसरी ओर मेरी विशाल नारायणी सेना है। तुम दोनों में से एक मुझे और दूसरा मेरी सेना को चुन लो।" चूँकि दृष्टि पहले अर्जुन पर पड़ी थी, अतः चुनने का पहला अवसर अर्जुन को दिया गया।
अर्जुन ने बिना क्षण भर सोचे केवल भगवान श्रीकृष्ण को ही चुन लिया, चाहे वे शस्त्र न उठाएँ। उनके लिए भगवान की उपस्थिति ही समस्त सेनाओं से बढ़कर थी। दुर्योधन मन ही मन प्रसन्न हुआ कि उसे विशाल नारायणी सेना मिल गई, और वह अपनी बुद्धिमानी पर इतरा उठा। किंतु वह न समझ सका कि अर्जुन ने साक्षात् जगत के स्वामी को पा लिया है।
अर्जुन ने भगवान से अत्यंत विनम्रता से प्रार्थना की कि वे उनके रथ के सारथी बनें। भक्तवत्सल श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा और भक्त की यह प्रार्थना सहर्ष स्वीकार कर ली। जो समस्त सृष्टि के स्वामी हैं, जिनकी आज्ञा से सूर्य-चंद्र चलते हैं, वे ही स्वयं अर्जुन के रथ की बागडोर थामकर घोड़े हाँकने के लिए तत्पर हो गए। यह भगवान की भक्तवत्सलता की पराकाष्ठा थी।
युद्धभूमि में भगवान ने सारथी का धर्म पूर्ण निष्ठा से निभाया। उन्होंने न केवल रथ को कुशलता से चलाया, अपितु प्रत्येक कठिन क्षण में अर्जुन का मार्गदर्शन किया, उनके संशय दूर किए और गीता का अमर उपदेश देकर उन्हें कर्तव्य-पथ पर स्थिर रखा। भगवान ने अनेक बार अपनी लीला से अर्जुन की रक्षा की और उन्हें विजय की ओर ले चले।
इस लीला का भाव यही है कि जिसके जीवन-रथ के सारथी स्वयं भगवान बन जाएँ, उसकी विजय निश्चित है। संसार-रूपी युद्धभूमि में जो भक्त भगवान को अपना मार्गदर्शक और सारथी मान लेता है, वह किसी भी विपत्ति से नहीं डरता। भगवान बल से नहीं, अपनी उपस्थिति और कृपा से ही भक्त को पार लगा देते हैं।