
रक्षाबंधन — कृष्ण का द्रौपदी को बहन मानना
Rakshabandhan — Krishna ka Draupadi ko Bahan Maanna
यह उन दिनों की कथा है जब श्रीकृष्ण ने राजसूय यज्ञ के अवसर पर अधर्मी शिशुपाल का वध किया था। शिशुपाल के सौ अपराध पूर्ण होने पर भगवान ने अपने दिव्य सुदर्शन चक्र से उसका संहार किया। कहते हैं कि उस समय चक्र चलाते हुए भगवान की तर्जनी अँगुली में हल्की चोट लग गई और उससे रक्त की धारा बहने लगी।
उस सभा में द्रौपदी भी उपस्थित थीं। जब उन्होंने देखा कि प्रभु की अँगुली से रक्त बह रहा है, तो उनका बहन-सा हृदय तड़प उठा। उन्होंने तनिक भी विलंब न किया और अपनी सुंदर रेशमी साड़ी के आँचल का एक टुकड़ा तुरंत फाड़कर श्रीकृष्ण की अँगुली पर बाँध दिया, जिससे रक्त बहना रुक गया। यह सेवा भाव, यह निःस्वार्थ स्नेह भगवान के मन को छू गया।
भक्तवत्सल श्रीकृष्ण ने उस चीर के टुकड़े को साधारण वस्त्र न समझा, अपितु उसे एक बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक माना। उन्होंने द्रौपदी से कहा — "पांचाली, आज तुमने जो यह वस्त्र मुझे बाँधा है, यह मेरे लिए राखी के समान है। तुम मेरी धर्म-बहन हो, और जब कभी तुम्हें मेरी आवश्यकता होगी, मैं इस एक-एक धागे का ऋण चुकाऊँगा। तुम्हारी लाज अब मेरी लाज है।"
समय बीता और वह दिन आया जब भरे दरबार में दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का दुस्साहस किया। उस असहाय क्षण में जब सारे बल-बुद्धि हार गए, तब द्रौपदी ने गोविंद को पुकारा। और भगवान ने अपने वचन का पूर्ण पालन किया — उन्होंने अनंत वस्त्रों का दान देकर पांचाली की लाज की रक्षा की और अपने ऊपर चढ़े उस स्नेह-ऋण को चुका दिया।
इसीलिए कहा जाता है कि रक्षाबंधन केवल एक धागे का बंधन नहीं, अपितु यह भाई-बहन के पवित्र स्नेह और परस्पर रक्षा के संकल्प का पर्व है। श्रीकृष्ण और द्रौपदी का यह संबंध सिखाता है कि सच्चा भाई अपनी बहन की रक्षा हर परिस्थिति में करता है, चाहे वह स्वयं भगवान ही क्यों न हों।
इस लीला का भाव यही है कि प्रभु के प्रति की गई छोटी-सी निःस्वार्थ सेवा भी उनके हृदय में अमिट स्थान बना लेती है। जो भक्त प्रेम से एक धागा भी बाँधता है, भगवान उसका सहस्र गुना प्रतिफल देकर उसकी सदैव रक्षा करते हैं।