
गीता उपदेश — अर्जुन का मोह भंग
Geeta Updesh — Arjun ka Moh Bhang
शांति के सारे प्रयास विफल हो जाने पर अंततः धर्म की स्थापना हेतु कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का महायुद्ध आरंभ होने को था। दोनों ओर विशाल सेनाएँ, शंखनाद और वीरों की गर्जना से सारा वातावरण गूँज उठा। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बनकर उनका रथ हाँक रहे थे।
अर्जुन ने भगवान से रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलने को कहा, ताकि वे देख सकें कि किनसे युद्ध करना है। किंतु जब अर्जुन ने सामने खड़े अपने पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, अपने भाई-बंधु, मामा, मित्र और स्वजनों को देखा, तो उनका हृदय करुणा और मोह से भर गया। उनके हाथ से गांडीव धनुष छूटने लगा, शरीर काँपने लगा और मुख सूख गया।
अर्जुन विषाद से भरकर बोले — "हे केशव! अपने ही स्वजनों को मारकर मुझे न राज्य चाहिए, न सुख। इस कुल-विनाश से तो अच्छा है कि मैं युद्ध ही न करूँ।" यह कहकर अर्जुन शोकाकुल होकर अपने रथ के पिछले भाग में बैठ गए और उन्होंने धनुष-बाण रख दिए। यही अर्जुन का मोह था, जो कर्तव्य के मार्ग में बाधा बन रहा था।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अमर गीता का उपदेश दिया। उन्होंने समझाया कि आत्मा अजर-अमर है, उसका न कभी जन्म होता है, न मृत्यु। शस्त्र उसे काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर त्यागकर नया धारण करती है। अतः शोक करना व्यर्थ है।
भगवान ने अर्जुन को कर्मयोग का रहस्य बताया — कि मनुष्य को फल की आसक्ति छोड़कर निष्काम भाव से अपना कर्तव्य करना चाहिए। उन्होंने भक्ति योग, ज्ञान योग और स्थितप्रज्ञ के लक्षण समझाए और अंत में अर्जुन को अपना दिव्य विश्वरूप दिखाकर यह प्रकट किया कि वे स्वयं परमात्मा हैं। भगवान ने कहा — "सर्व धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जा, मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा।"
गीता के इस अमृतोपदेश को सुनकर अर्जुन का मोह पूर्ण रूप से नष्ट हो गया। उनका ज्ञान-चक्षु खुल गया, संशय मिट गए और वे बोले — "हे अच्युत! मेरा मोह नष्ट हो गया, अब मुझे स्मृति प्राप्त हो गई है। मैं आपके वचन के अनुसार अपना कर्तव्य पालन करूँगा।" यह कहकर अर्जुन युद्ध के लिए दृढ़ संकल्प के साथ खड़े हो गए।
इस लीला का भाव यही है कि श्रीमद्भगवद्गीता समस्त मानव जाति के लिए जीवन-मार्ग का दिव्य प्रकाश है। जब भी मन मोह, भय या संशय से घिर जाए, तब भगवान की शरण और निष्काम कर्म का यह उपदेश ही जीवन की सच्ची राह दिखाता है।