
शंखचूड़, अरिष्टासुर, केशी और व्योमासुर वध
Shankhachud, Arishtasura, Keshi aur Vyomasura Vadh
रास-लीला के पश्चात एक बार श्रीकृष्ण और बलराम अपनी गोपियों के संग वन में विहार कर रहे थे। तभी शंखचूड़ नामक एक यक्ष, जो कुबेर का अनुचर था, अपने अभिमान में गोपियों को भयभीत करके उत्तर दिशा की ओर हाँकता हुआ ले चला। गोपियों ने 'हे कृष्ण! हे राम!' कहकर पुकारा। दोनों भाई शालवृक्ष उखाड़कर उसके पीछे दौड़े। श्रीकृष्ण ने शीघ्र ही उसे जा पकड़ा और एक ही प्रहार से उसका सिर तथा उसकी मणि निकाल ली। वह मणि उन्होंने बलराम जी को दे दी और गोपियाँ पुनः निर्भय हो गईं।
कुछ समय पश्चात कंस का भेजा अरिष्टासुर नामक दैत्य एक विशाल बैल का रूप धारण करके वृंदावन में आ धमका। उसके भयंकर हुंकार से पृथ्वी काँपने लगी, गौएँ भड़क उठीं और गर्भवती गौओं के गर्भ तक गिरने लगे। उसके नुकीले सींग और अग्नि-सी लाल आँखें देखकर ब्रजवासी भयभीत हो उठे। श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को आश्वस्त किया और स्वयं निर्भय होकर उसके सम्मुख आ खड़े हुए।
अरिष्टासुर क्रोध में सिर झुकाकर श्रीकृष्ण पर टूट पड़ा। भगवान ने उसके सींग पकड़कर उसे पीछे धकेल दिया और फिर पैर से दबाकर, उसके एक सींग को उखाड़कर, उसी से उसे बुरी तरह मारा। रक्त वमन करता हुआ वह वृषभासुर धरती पर गिरकर शान्त हो गया। इस प्रकार वृंदावन एक और आतंक से मुक्त हो गया और देवताओं ने हर्ष से पुष्पवर्षा की।
अब कंस ने केशी नामक दैत्य को भेजा, जिसने एक विशालकाय, प्रचण्ड अश्व का रूप धारण किया। वह हिनहिनाता हुआ, अपने खुरों से धरती खोदता, वृंदावन में उत्पात मचाने लगा। श्रीकृष्ण निर्भय होकर उसके सामने आए। केशी ने मुख खोलकर कृष्ण को निगलना चाहा, तभी भगवान ने अपनी भुजा उसके मुख में डाल दी और उसे भीतर ही इतना फुला दिया कि उस अश्व-दैत्य का दम घुटने लगा और वह छटपटाकर प्राण त्याग बैठा। इसी लीला के कारण भगवान का एक नाम 'केशव' पड़ा।
इसके पश्चात व्योमासुर नामक एक मायावी दैत्य आया, जो मयासुर का पुत्र था और छल-कपट में निपुण था। एक दिन जब ग्वालबाल चोर-सिपाही का खेल खेल रहे थे, तब व्योमासुर भी एक ग्वालबाल का रूप धरकर उनमें मिल गया। खेल के बहाने वह 'चोर' बने बहुत-से बालकों को पकड़-पकड़कर एक पर्वत की गुफा में ले जाकर बड़ी शिला से बन्द करता गया। थोड़े ही समय में अनेक सखा गुफा में कैद हो गए।
अन्तर्यामी श्रीकृष्ण उसकी माया समझ गए। उन्होंने व्योमासुर को दबोच लिया। वह अपने विकराल रूप में प्रकट होकर छूटने का प्रयास करने लगा, पर भगवान की पकड़ से न बच सका। श्रीकृष्ण ने उसे पशु की भाँति धरती पर पटककर उसका अन्त कर दिया, गुफा की शिला हटाकर सभी कैद सखाओं को मुक्त कर दिया, और देवताओं ने प्रसन्न होकर भगवान की स्तुति की।
इन सभी लीलाओं की महिमा यही है कि अधर्म चाहे यक्ष, बैल, अश्व या मायावी किसी भी रूप में प्रकट हो, भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं और छल-बल दोनों का नाश कर देते हैं — प्रभु की शरण ही सबसे बड़ी निर्भयता है।