
समुद्र मंथन और नीलकंठ
Samudra Manthan and Neelkanth
१. दुर्वासा का श्राप
एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इन्द्र को एक दिव्य पारिजात पुष्पों की माला भेंट की। इन्द्र अपने ऐश्वर्य के मद में चूर थे — उन्होंने वह माला लेकर अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर डाल दी। ऐरावत ने उसे सूँड से उतारकर पैरों तले रौंद दिया।
दुर्वासा क्रोधित हो उठे और श्राप दे दिया — "तुम्हारे अहंकार ने लक्ष्मी का अपमान किया है। आज से तीनों लोकों का समस्त ऐश्वर्य, वैभव और तेज नष्ट हो जाएगा।"
उसी क्षण देवलोक श्रीहीन हो गया। लक्ष्मी जी क्षीरसागर में समा गईं। देवता निस्तेज हो गए और असुरों ने उन्हें युद्ध में पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।
२. विष्णु जी का परामर्श
पराजित देवता ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु के पास पहुँचे। विष्णु जी ने कहा —
"अभी तुममें असुरों से लड़ने का बल नहीं है। एक ही उपाय है — क्षीरसागर का मंथन करो। उसमें से अमृत निकलेगा, जिसे पीकर तुम अजर-अमर हो जाओगे। परन्तु यह कार्य अकेले तुमसे नहीं होगा। असुरों से संधि करो और उन्हें अमृत का लोभ देकर साथ लाओ।"
देवताओं ने असुरराज बलि से संधि की और दोनों पक्ष मंथन के लिए तैयार हो गए।
३. मंदराचल और वासुकि
मथानी बनाने के लिए मंदराचल पर्वत को उखाड़ा गया और रस्सी बनने के लिए नागराज वासुकि तैयार हुए।
पर्वत को समुद्र में रखते ही वह डूबने लगा। तब भगवान विष्णु ने कच्छप (कूर्म) अवतार धारण किया और अपनी विशाल पीठ पर पर्वत को थाम लिया।
असुरों ने कहा — "हम श्रेष्ठ कुल के हैं, हम पूँछ की ओर नहीं पकड़ेंगे।" इसलिए असुरों ने वासुकि का मुख वाला भाग पकड़ा और देवताओं ने पूँछ वाला। मंथन आरंभ हुआ — असुर एक ओर खींचते, देवता दूसरी ओर।
४. हलाहल का प्रकट होना
वासुकि के मुख से निकलती अग्नि-श्वास से असुर झुलसने लगे। समुद्र भीषण वेग से मथा जाने लगा।
तभी सबसे पहले जो निकला, वह अमृत नहीं था — वह था हलाहल (जिसे कालकूट भी कहते हैं)। यह ब्रह्मांड का सर्वाधिक भयंकर विष था।
उसकी ज्वालाएँ चारों दिशाओं में फैलने लगीं। उसका धुआँ ही इतना प्रचंड था कि देवता, असुर, नाग, यक्ष, गंधर्व — सब मूर्च्छित होने लगे। समुद्र के जीव मरने लगे, वृक्ष सूखने लगे, तीनों लोक जलने लगे।
न देवता उसे सह सके, न असुर। सब भागकर ब्रह्मा जी की शरण में गए। ब्रह्मा जी बोले — "यह विष केवल एक ही सह सकते हैं — देवाधिदेव महादेव। उन्हीं के पास चलो।"
५. शिव जी की शरण
सब कैलाश पहुँचे और शिव जी की स्तुति करने लगे —
"हे महादेव! आप ही आदि हैं, आप ही अंत हैं। सृष्टि संकट में है। यदि आपने रक्षा न की तो कोई नहीं बचेगा।"
शिव जी ने माता पार्वती की ओर देखा और कहा — "देवी, ये सब मेरी शरण में आए हैं। प्राणियों की रक्षा करना ही सबसे बड़ा धर्म है। जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझकर उसे हर ले, वही वास्तव में शिव है।"
पार्वती जी को यह जानते हुए भी कि क्या होने वाला है, अनुमति देनी पड़ी — क्योंकि जगत की रक्षा से बड़ा कुछ नहीं।
६. विष का पान
शिव जी उस भयंकर विष के समीप पहुँचे। उन्होंने अपनी अंजुलि में समस्त हलाहल को समेट लिया और उसे पी गए।
पर उन्होंने उसे निगला नहीं। यदि वे उसे उदर में उतार लेते, तो समस्त सृष्टि उनके उदर में ही समाई है — वह जल जाती। इसलिए माता पार्वती ने तुरंत उनका कंठ अपने हाथों से दबा दिया, और विष कंठ में ही रुक गया।
विष के प्रभाव से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया। तभी से वे नीलकंठ कहलाए।
७. शीतल करने के उपचार
विष की जलन इतनी प्रचंड थी कि शिव जी के मस्तक पर ताप बढ़ने लगा। तब —
देवताओं ने उनके ऊपर निरंतर जल अर्पित किया — इसी से जलाभिषेक की परंपरा चली।
चंद्रमा को उनके मस्तक पर स्थापित किया गया, जिससे शीतलता मिले — इसीलिए वे चंद्रशेखर कहलाए।
गंगा जी उनकी जटाओं में विराजीं।
बिल्व पत्र, धतूरा, भाँग और आक — ये शीतल एवं विषहर वस्तुएँ उन्हें अर्पित की गईं। यही कारण है कि आज भी शिव पूजा में ये चढ़ाए जाते हैं।
८. विष की कुछ बूँदें
कहा जाता है कि पान करते समय हलाहल की कुछ बूँदें छलककर पृथ्वी पर गिर गईं। उन्हीं को साँप, बिच्छू और कुछ विषैले पौधों ने ग्रहण कर लिया — इसीलिए संसार में विष का अंश शेष रह गया।
९. मंथन का पुनः आरंभ और चौदह रत्न
विष का संकट टलने पर मंथन फिर आरंभ हुआ। क्रमशः चौदह रत्न प्रकट हुए —
हलाहल, कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रम्भा, माता लक्ष्मी, वारुणी, चंद्रमा, पारिजात, पांचजन्य शंख, धन्वंतरि, और अंत में अमृत कलश।
अमृत के लिए फिर विवाद हुआ, तब विष्णु जी ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया।
१०. कथा का सार
यह कथा का सबसे बड़ा संदेश यही है — मंथन में सबसे पहले विष निकलता है, अमृत सबसे अंत में। जीवन में भी किसी भी बड़े प्रयास का आरंभिक फल कड़वा ही होता है, धैर्य रखने वाले को ही अमृत मिलता है।
दूसरा संदेश — अमृत सबने बाँट लिया, परन्तु विष कोई नहीं लेना चाहता था। शिव जी ने वह लिया जो किसी को नहीं चाहिए था। जो समाज का विष अपने कंठ में धारण कर ले, वही महादेव कहलाता है।
तीसरा — शिव जी ने विष न निगला, न उगला। उसे कंठ में रोक लिया। यह संयम का प्रतीक है — कड़वाहट को न भीतर उतरने देना, न दूसरों पर फेंकना।
श्रावण मास से संबंध
मान्यता है कि यह घटना श्रावण मास में घटी थी। इसीलिए इस माह में शिव जी पर जल और दूध चढ़ाया जाता है, और कांवड़ यात्रा निकाली जाती है — ताकि नीलकंठ के कंठ की ज्वाला शांत रहे।