Ravana's Devotion — The Shiva Tandava Stotra and the Atmalinga of Gokarna

रावण की भक्ति — शिव तांडव स्तोत्र और आत्मलिंग की कथा (गोकर्ण)

Ravana's Devotion — The Shiva Tandava Stotra and the Atmalinga of Gokarna

१. रावण — एक भिन्न परिचय

रावण को हम प्रायः केवल "राक्षसराज" के रूप में जानते हैं। परन्तु उसका एक और पक्ष है, जिसे जाने बिना उसकी कथा अधूरी रह जाती है।

रावण ऋषि विश्रवा का पुत्र और महर्षि पुलस्त्य का पौत्र था — अर्थात् ब्राह्मण वंश में जन्मा।

वह चारों वेदों और छहों शास्त्रों का ज्ञाता था। इसीलिए उसके दस सिर को कई विद्वान दस दिशाओं का ज्ञान अथवा चार वेद और छह शास्त्रों का प्रतीक मानते हैं।

वह प्रकांड ज्योतिषी था, आयुर्वेद का जानकार था, वीणा वादन में निपुण था, और सामवेद का महान गायक था।

और सबसे बड़ी बात — वह भगवान शिव का परम भक्त था।

उसकी कथा हमें यह सिखाती है कि ज्ञान और भक्ति होते हुए भी यदि अहंकार न मिटे, तो पतन निश्चित है।

२. कैलाश उठाने का प्रसंग

एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से यात्रा कर रहा था। कैलाश के ऊपर पहुँचते ही विमान रुक गया — आगे बढ़ा ही नहीं।

रावण ने कारण पूछा। शिव जी के गण नंदी ने आकर कहा — "यह कैलाश है। यहाँ महादेव पार्वती जी के साथ एकांत में हैं। यहाँ से कोई नहीं जा सकता।"

रावण के अहंकार को यह चुभ गया। उसने नंदी का उपहास किया — "वानर-मुख! तू मुझे रोकने वाला कौन?"

नंदी ने क्रोधित होकर श्राप दिया — "तू आज वानर का उपहास कर रहा है — स्मरण रखना, तेरे विनाश का कारण वानर ही बनेंगे।"

(यह श्राप आगे चलकर सत्य सिद्ध हुआ।)

क्रोध में रावण ने कहा — "तो मैं इस पर्वत को ही उखाड़ फेंकता हूँ!"

उसने अपनी बीस भुजाएँ कैलाश के नीचे लगाईं और पूरे बल से पर्वत को उठाना आरंभ किया।

३. शिव जी का अंगूठा

कैलाश डोलने लगा। माता पार्वती भयभीत होकर शिव जी से लिपट गईं।

शिव जी ने कोई अस्त्र नहीं उठाया, कोई गर्जना नहीं की।

उन्होंने बस अपने दाहिने पैर के अंगूठे से पर्वत को हल्का-सा दबा दिया।

उसी क्षण रावण की बीसों भुजाएँ पर्वत के नीचे दब गईं। वह पीड़ा से चीख उठा — उसकी चीख इतनी भयंकर थी कि तीनों लोक काँप गए।

(कहा जाता है कि उसी चीख के कारण उसका नाम "रावण" पड़ा — "जो रुलाए / जो गर्जना करे"।)

४. शिव तांडव स्तोत्र की रचना

भुजाएँ दबी हुईं, असह्य पीड़ा, और कोई मार्ग नहीं।

तब रावण ने वह किया जो उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।

उसने पीड़ा में ही, उसी अवस्था में, भगवान शिव की स्तुति आरंभ कर दी। और वह स्तुति कोई साधारण स्तुति नहीं थी — वह संस्कृत साहित्य की सर्वाधिक ओजस्वी रचनाओं में गिनी जाती है।

यही है — शिव तांडव स्तोत्र।

इसका आरंभ इस प्रकार है —

"जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥"

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका छंद और नाद है। इसे पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो डमरू बज रहा हो और तांडव चल रहा हो। "डमड्डमड्डमड्डमन्" — यह ध्वनि स्वयं डमरू की प्रतिध्वनि है।

कहा जाता है कि रावण ने इसे सामवेद की शैली में गाया था, केवल पढ़ा नहीं। उसने अपनी नसों को खींचकर वीणा बनाई और अपनी ही देह से संगीत उत्पन्न किया।

५. रावणेश्वर और चंद्रहास

स्तुति सुनकर शिव जी प्रसन्न हो गए। उन्होंने अंगूठा हटाया और रावण मुक्त हुआ।

शिव जी ने कहा — "तुम्हारी स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हें आज से एक नाम देता हूँ — रावण।"

और उन्होंने उसे एक अमोघ खड्ग प्रदान किया — चंद्रहास।

इसके पश्चात् रावण शिव का सर्वाधिक निष्ठावान भक्त बन गया।

६. दस सिरों का बलिदान

एक और प्रसिद्ध प्रसंग यह है कि रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तप किया।

जब शिव जी प्रकट नहीं हुए, तो उसने अपना एक सिर काटकर अग्नि में आहुति दे दी।

फिर दूसरा, फिर तीसरा... इस प्रकार उसने नौ सिर काट डाले।

जब वह दसवाँ सिर काटने को उद्यत हुआ, तब शिव जी प्रकट हो गए। उन्होंने उसे रोका और उसके सभी सिर पुनः जोड़ दिए।

यह प्रसंग रावण की भक्ति की तीव्रता दर्शाता है — परन्तु साथ ही उसके स्वभाव की चरम प्रवृत्ति भी।

७. आत्मलिंग की कथा — माता कैकसी की इच्छा

अब आती है वह कथा, जो रावण की भक्ति और उसकी सबसे बड़ी भूल — दोनों को एक साथ दर्शाती है।

रावण की माता कैकसी भी शिव की परम भक्त थीं। वे प्रतिदिन बालू से शिवलिंग बनाकर पूजा करती थीं।

एक दिन समुद्र की लहरें आईं और वह बालू का लिंग बह गया। माता व्यथित होकर रोने लगीं।

रावण ने कहा — "माता, आप शोक न करें। मैं कैलाश जाकर स्वयं महादेव से उनका आत्मलिंग ले आऊँगा। फिर आपकी पूजा कभी खंडित नहीं होगी।"

८. आत्मलिंग क्या है

आत्मलिंग साधारण शिवलिंग नहीं है।

यह स्वयं शिव की आत्मशक्ति का प्रतीक है। मान्यता है कि जिसके पास आत्मलिंग होगा, वह अजेय हो जाएगा — उसे कोई पराजित नहीं कर सकेगा, और उसकी नगरी पर कोई विपत्ति नहीं आएगी।

९. घोर तपस्या और वरदान

रावण कैलाश पहुँचा और उसने अत्यंत कठोर तप आरंभ किया।

अंततः शिव जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले — "वर माँगो।"

रावण ने कहा — "प्रभु, मुझे आपका आत्मलिंग दीजिए।"

शिव जी एक क्षण के लिए रुके। वे जानते थे कि यदि आत्मलिंग लंका पहुँच गया, तो रावण अजेय हो जाएगा और उसका अहंकार असीम हो जाएगा — जो सृष्टि के लिए संकट बनेगा।

परन्तु वे प्रसन्न होकर वर देने का वचन दे चुके थे।

१०. एक शर्त

शिव जी ने आत्मलिंग रावण के हाथों में रख दिया, परन्तु एक शर्त लगा दी —

"इसे मार्ग में कहीं भी भूमि पर मत रखना। जहाँ यह एक बार भूमि पर रख दिया जाएगा, वहीं सदा के लिए स्थापित हो जाएगा — फिर कोई शक्ति इसे हटा नहीं सकेगी।"

रावण ने वचन दिया और आत्मलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा।

११. देवताओं की चिंता

देवता व्याकुल हो उठे। यदि आत्मलिंग लंका पहुँच गया तो रावण का अत्याचार अनंत हो जाएगा।

वे सब भगवान विष्णु के पास पहुँचे। विष्णु जी ने कहा — "चिंता मत करो, उपाय है। परन्तु इसमें गणेश जी की सहायता चाहिए।"

१२. नारद और सूर्य की योजना

योजना बनी।

रावण अत्यंत नियमनिष्ठ था — वह संध्यावंदन कभी नहीं छोड़ता था। यही उसकी दिनचर्या की सबसे दृढ़ बात थी, और यही उसकी कमज़ोरी बनी।

नारद जी ने सूर्यदेव से प्रार्थना की और भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सूर्य को कुछ क्षण के लिए ढक दिया।

अचानक अंधकार छा गया। रावण ने आकाश देखा — "अरे, संध्या का समय हो गया! मुझे संध्यावंदन करना ही होगा।"

वह उस समय गोकर्ण (आज के कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ ज़िले में) पहुँच चुका था।

परन्तु समस्या यह थी — आत्मलिंग भूमि पर रखा नहीं जा सकता, और संध्यावंदन हाथ में लिंग लेकर हो नहीं सकता।

१३. बालक गणेश का आगमन

तभी वहाँ एक ब्राह्मण बालक दिखाई दिया — जो वस्तुतः स्वयं गणेश जी थे।

रावण ने कहा — "बालक, कुछ देर यह लिंग पकड़ लो। मैं संध्या करके तुरंत आता हूँ।"

बालक ने कहा — "यह तो बहुत भारी है। मैं छोटा हूँ, अधिक देर नहीं पकड़ सकूँगा।"

रावण ने आग्रह किया।

तब बालक ने शर्त रखी —

"ठीक है, मैं पकड़ लेता हूँ। परन्तु जब यह मुझसे न सँभलेगा, तो मैं तीन बार आपको पुकारूँगा। यदि आप तब तक न आए, तो मैं इसे भूमि पर रख दूँगा।"

रावण को कोई और उपाय न दिखा। उसने स्वीकार कर लिया और संध्यावंदन करने चला गया।

१४. तीन पुकार

रावण ने अभी संध्या आरंभ ही की थी कि पहली पुकार आई — "रावण!"

थोड़ी ही देर में दूसरी — "रावण!"

और उसके तुरंत बाद तीसरी — "रावण!"

रावण ने हाथ उठाकर संकेत किया कि रुको — परन्तु तब तक बालक ने आत्मलिंग भूमि पर रख दिया था।

१५. आत्मलिंग स्थापित हो गया

रावण दौड़कर आया। उसने आत्मलिंग को उठाने का प्रयास किया।

परन्तु वह टस से मस न हुआ।

उसने अपनी समस्त बीस भुजाओं का बल लगाया — जिन भुजाओं ने कैलाश तक उठा लिया था — परन्तु वह छोटा-सा लिंग एक इंच भी न हिला।

खींचते-खींचते वह विकृत होकर गाय के कान जैसा दिखने लगा।

इसी कारण उस स्थान का नाम पड़ा — गोकर्ण (गो = गाय, कर्ण = कान)। और वह लिंग महाबलेश्वर कहलाया — क्योंकि उसे महाबली रावण भी न हिला सका।

१६. रावण का क्रोध

रावण को समझ आ गया कि उसके साथ छल हुआ है।

उसने क्रोध में उस बालक को खोजा और उसके सिर पर प्रहार किया। (मान्यता है कि इसी कारण गोकर्ण के गणेश मंदिर में गणेश जी के सिर पर एक गड्ढा दिखाई देता है।)

फिर उसने आत्मलिंग के आवरण और आभूषणों को क्रोध में चारों दिशाओं में फेंक दिया।

मान्यता है कि वे जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ भी शिवालय बने — सज्जेश्वर, गुणवंतेश्वर, मुरुडेश्वर और धारेश्वर। ये चारों गोकर्ण के साथ मिलकर आज भी प्रसिद्ध हैं।

मुरुडेश्वर आज विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहाँ अरब सागर के तट पर शिव जी की विशाल प्रतिमा स्थित है।

१७. गोकर्ण का माहात्म्य

गोकर्ण को दक्षिण का काशी कहा जाता है।

यहाँ का महाबलेश्वर लिंग विशेष है — यह प्राणलिंग माना जाता है, और यहाँ भक्तों को लिंग को स्पर्श करने की अनुमति मिलती है, जो अन्यत्र दुर्लभ है।

मान्यता है कि गोकर्ण में एक बार दर्शन कर लेने से काशी के अनेक दर्शनों का फल मिलता है।

१८. कथा का सार

पहला संदेश — भक्ति और अहंकार साथ नहीं चल सकते। रावण की भक्ति में कोई कमी नहीं थी। उसने नौ सिर काट दिए, उसने ऐसा स्तोत्र रचा जो युगों से गाया जाता है। परन्तु उसका उद्देश्य समर्पण नहीं, अधिकार था। वह शिव को पाना नहीं, शिव की शक्ति को अपने वश में करना चाहता था। जो भक्ति कुछ पाने के लिए हो, वह सौदा है — भक्ति नहीं।

दूसरा संदेश — शर्त का पालन। शिव जी ने एक ही शर्त रखी थी, और रावण उसे नहीं निभा सका। जो व्यक्ति सब कुछ पा लेता है पर एक अनुशासन नहीं निभा पाता, वह सब खो देता है।

तीसरा संदेश — शक्ति का दुरुपयोग रोकना भी धर्म है। शिव जी ने वचन दिया था, इसलिए आत्मलिंग दिया। परन्तु विष्णु और गणेश ने युक्ति से उसे रोका। कभी-कभी सृष्टि की रक्षा के लिए युक्ति भी आवश्यक होती है।

चौथा संदेश — बीस भुजाएँ बनाम एक बालक। जो कैलाश उठा सकता था, वह एक छोटा-सा लिंग न उठा सका। बल का कोई मूल्य नहीं जब नियति का निर्णय हो चुका हो।

पाँचवाँ संदेश — रावण को खलनायक कहना सरल है, पर उससे सीखना कठिन। उसमें ज्ञान था, भक्ति थी, तप था, कला थी — सब कुछ था। एक अहंकार ने वह सब व्यर्थ कर दिया। यही इस कथा की सबसे बड़ी चेतावनी है।

१९. एक विनम्र निवेदन

इस कथा के अनेक पाठभेद हैं। शिव पुराण, स्कंद पुराण, रामायण (उत्तरकांड) और कर्नाटक की स्थानीय स्थल-पुराण परंपराओं में विवरण भिन्न हैं।

शिव तांडव स्तोत्र के रचयिता के रूप में रावण का नाम परंपरा से आता है; विद्वानों में इसकी रचना-तिथि और कर्तृत्व पर मतभेद भी हैं।

किसी एक पाठ को अंतिम मान लेना उचित नहीं। कथा का मर्म सर्वत्र एक ही है — भक्ति महान है, परन्तु अहंकार सहित की गई भक्ति अपने ही भक्त को ले डूबती है।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Shani Dev and Shiva: The Guru of Justice and His Divine Master

शनि देव और शिव: न्याय के देवता और उनके आराध्य

Devi-Devta
Nandi ki Katha

नंदी की कथा

Devi-Devta
Shiva-Hanuman Sambandh

शिव-हनुमान संबंध

Devi-Devta
Dwadash Jyotirlinga

द्वादश ज्योतिर्लिंग

Devi-Devta
The Story of Upamanyu — The Boy Who Won an Ocean of Milk from Shiva

उपमन्यु की कथा — क्षीरसागर का वरदान

Devi-Devta
The Curse on the Moon and the Founding of Somnath

चंद्रमा को श्राप और सोमनाथ की स्थापना

Devi-Devta