
51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति
Origin of the 51 Shakti Peethas
१. पृष्ठभूमि — दक्ष यज्ञ का प्रसंग
प्रजापति दक्ष ने अपने अहंकारवश एक विराट यज्ञ किया, जिसमें उन्होंने जानबूझकर भगवान शिव को न तो निमंत्रण भेजा और न ही यज्ञ में उनका कोई भाग रखा।
उनकी पुत्री सती बिना बुलाए पिता के घर पहुँचीं, और वहाँ भरी सभा में अपने पति महादेव का अपमान होते देखा। यह असह्य होने पर उन्होंने योगाग्नि प्रज्वलित कर अपनी देह त्याग दी।
समाचार पाकर शिव जी ने अपनी जटा से वीरभद्र को प्रकट किया, जिसने यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का वध किया।
२. शिव का शोक और विनाशकारी भ्रमण
इसके पश्चात् जो हुआ, वही 51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति का कारण बना।
भगवान शिव स्वयं यज्ञस्थल पर पधारे। उन्होंने सती की निष्प्राण देह को उठाया और अपने कंधे पर धारण कर लिया।
फिर वे विक्षिप्त की भाँति समस्त सृष्टि में भ्रमण करने लगे — न कोई दिशा, न कोई गंतव्य। कभी हिमालय, कभी वन, कभी सागर तट। वे रुकते नहीं थे, बस चलते जाते थे।
उनका शोक रुद्र तांडव में बदल गया। जहाँ-जहाँ उनके चरण पड़ते, वहाँ भूमि काँप उठती। पर्वत दरकने लगे, समुद्र उमड़ने लगे, नक्षत्र अपने पथ से डगमगाने लगे।
देवता भयभीत हो उठे — यदि यह क्रम न रुका तो समय से पूर्व ही प्रलय हो जाएगा। परन्तु शिव जी को रोकने का साहस किसी में नहीं था।
३. सुदर्शन चक्र का प्रयोग
सब ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के पास पहुँचे। विचार-विमर्श के बाद यह निष्कर्ष निकला —
जब तक सती की देह शिव के कंधे पर है, तब तक उनका मोह और तांडव नहीं रुकेगा। देह हटानी होगी — परन्तु उनसे छीनकर नहीं, अन्यथा क्रोध और बढ़ेगा।
तब भगवान विष्णु ने अत्यंत सूक्ष्म रूप से, बिना शिव जी को आभास दिए, अपने सुदर्शन चक्र से सती की देह के खंड करने आरंभ किए।
चक्र अदृश्य रूप से चलता रहा और एक-एक करके अंग पृथ्वी पर गिरते गए। शिव जी को इसका भान ही न हुआ — वे तो शोक में लीन चलते ही जा रहे थे।
अंततः जब कंधे पर कुछ शेष न बचा, तब उनका मोह भंग हुआ। वे रुके, और शांत होकर कैलाश लौट गए, जहाँ वे गहन समाधि में लीन हो गए।
४. शक्तिपीठों का प्रकट होना
सती के अंग, आभूषण और वस्त्र जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान सामान्य भूमि न रहे — वे शक्तिपीठ बन गए।
"पीठ" का अर्थ है आसन — अर्थात् वह स्थान जहाँ देवी स्वयं विराजमान हुईं।
प्रत्येक शक्तिपीठ की तीन विशेषताएँ हैं —
वहाँ देवी का एक विशिष्ट नाम है (जैसे कामाख्या, विशालाक्षी, ज्वालामुखी)।
वहाँ शिव जी भी भैरव रूप में उपस्थित रहते हैं, जो उस पीठ के रक्षक हैं।
वहाँ सती का कोई एक अंग या आभूषण गिरा माना जाता है।
मान्यता है कि शक्तिपीठ पर की गई साधना शीघ्र फलती है, क्योंकि वहाँ शक्ति का प्रत्यक्ष निवास है।
५. संख्या का प्रश्न — 51, 52, 108 या 4?
यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है — शक्तिपीठों की संख्या विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग बताई गई है।
शिव पुराण में 51 का उल्लेख मिलता है।
देवी भागवत पुराण में 108 पीठों की चर्चा है।
देवी गीता में 72 का वर्णन है।
तंत्र चूड़ामणि में 52 पीठ गिनाए गए हैं।
कुछ परंपराओं में केवल 4 आदि शक्तिपीठ को मूल माना जाता है।
कुछ में 18 महा शक्तिपीठ प्रमुख माने जाते हैं।
लोक-परंपरा में सर्वाधिक प्रचलित संख्या 51 है, और इसका एक सुंदर कारण बताया जाता है — संस्कृत वर्णमाला में 51 अक्षर हैं। मान्यता है कि प्रत्येक शक्तिपीठ एक बीजाक्षर का प्रतिनिधित्व करता है। इसीलिए देवी को "मातृका स्वरूपा" कहा जाता है — समस्त भाषा, ध्वनि और मंत्र की जननी।
पीठों की सूची में भी ग्रंथ-भेद है, अतः किसी एक निश्चित सूची को अंतिम मान लेना उचित नहीं।
६. चार आदि शक्तिपीठ
सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रमुख माने जाने वाले चार पीठ ये हैं —
बिमला / पुरुषोत्तम पीठ (पुरी, ओडिशा) — यहाँ सती की नाभि गिरी। भैरव — जगन्नाथ।
तारा तारिणी (ब्रह्मपुर, ओडिशा) — यहाँ वक्षस्थल गिरा।
कामाख्या (गुवाहाटी, असम) — यहाँ योनि भाग गिरा। यह सर्वाधिक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। भैरव — उमानंद।
कालीघाट / दक्षिणा कालिका (कोलकाता, प. बंगाल) — यहाँ दाहिने पैर की अंगुलियाँ गिरीं। भैरव — नकुलेश।
७. प्रमुख शक्तिपीठ और उनके अंग
अत्यधिक प्रसिद्ध पीठों का संक्षिप्त परिचय —
कामाख्या (असम) — योनि भाग। यहाँ कोई मूर्ति नहीं, केवल एक शिला-कुंड है जिससे निरंतर जल प्रवाहित होता है। यहाँ अम्बुबाची मेला लगता है, जब मंदिर तीन दिन बंद रहता है।
ज्वालामुखी (कांगड़ा, हिमाचल) — जिह्वा। यहाँ कोई प्रतिमा नहीं — भूमि से निकलती नौ प्राकृतिक ज्वालाएँ ही देवी का स्वरूप हैं।
नैना देवी (बिलासपुर, हिमाचल) — नेत्र।
वैष्णो देवी / त्रिकूट — कई मान्यताओं में इसे भी पीठ माना जाता है, यद्यपि शास्त्रीय 51 की सूचियों में यह प्रायः नहीं आता।
विशालाक्षी (काशी, उ.प्र.) — कर्णकुंडल। भैरव — काल भैरव।
विंध्यवासिनी / विंध्याचल (मिर्ज़ापुर, उ.प्र.) — कई परंपराओं में प्रमुख पीठ।
हिंगलाज (बलूचिस्तान, पाकिस्तान) — ब्रह्मरंध्र (मस्तक का ऊपरी भाग)। यह सर्वाधिक पश्चिमी शक्तिपीठ है।
शारदा पीठ (पाक अधिकृत कश्मीर) — दाहिना हाथ। यह प्राचीन काल में विद्या का महान केंद्र था।
मानस / दाक्षायणी (कैलाश-मानसरोवर, तिब्बत) — दाहिना हाथ (कुछ पाठों में)।
गुह्येश्वरी (काठमांडू, नेपाल) — घुटने / गुह्य भाग। पशुपतिनाथ के निकट।
अम्बाजी (गुजरात) — हृदय।
महालक्ष्मी / करवीर (कोल्हापुर, महाराष्ट्र) — नेत्र।
कन्याकुमारी (तमिलनाडु) — पृष्ठ भाग। यह सबसे दक्षिणी पीठ है।
श्रीशैलम / भ्रमराम्बा (आंध्र प्रदेश) — ग्रीवा। यह ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों है।
तारापीठ (बीरभूम, प. बंगाल) — नेत्रगोलक। यह तांत्रिक साधना का महत्वपूर्ण केंद्र है।
जयंती (मेघालय) — बायीं जंघा।
त्रिपुर सुंदरी (उदयपुर, त्रिपुरा) — दाहिना पैर। "त्रिपुरा" राज्य का नाम इसी देवी से जुड़ा है।
नैनादेवी, चामुंडा, बज्रेश्वरी (हिमाचल) — विभिन्न अंगों से संबद्ध।
शाकंभरी (सहारनपुर, उ.प्र.), ललिता / नैमिषारण्य, सर्वशैल / राजराजेश्वरी (आंध्र), महामाया (अमरनाथ, कश्मीर — कंठ), उज्जयिनी / हरसिद्धि (उज्जैन — कोहनी), कुरुक्षेत्र / सावित्री (हरियाणा — गुल्फ), मणिबंध / गायत्री (पुष्कर, राजस्थान — कलाई), विराट / अम्बिका (राजस्थान — बायें पैर की अंगुलियाँ), चट्टल / भवानी (चटगाँव, बांग्लादेश — दाहिनी भुजा), सुगंधा (बरिसाल, बांग्लादेश — नासिका), यशोर / यशोरेश्वरी (बांग्लादेश — हथेली), किरीट (प. बंगाल — मुकुट), कालमाधव (मध्य प्रदेश — बायाँ नितंब)।
८. भारत के बाहर के शक्तिपीठ
ध्यान देने योग्य बात यह है कि शक्तिपीठ केवल आज के भारत में नहीं हैं — वे पूरे उपमहाद्वीप में फैले हैं। पाकिस्तान (हिंगलाज, शारदा), बांग्लादेश (सुगंधा, यशोरेश्वरी, चट्टल), नेपाल (गुह्येश्वरी, दंतकाली), श्रीलंका (इंद्राक्षी) और तिब्बत (मानस) तक।
यह भौगोलिक विस्तार दर्शाता है कि प्राचीन काल में यह समस्त क्षेत्र एक ही सांस्कृतिक धारा से जुड़ा था।
९. भैरव की उपस्थिति का अर्थ