
नंद बाबा का वरुण लोक से छूटना
Nand Baba Ka Varun Lok Se Chhutna
एक बार एकादशी का पवित्र व्रत रखकर नन्द बाबा ने द्वादशी के दिन उपवास का पारण करने का संकल्प किया। शास्त्र के अनुसार द्वादशी में एक विशेष मुहूर्त होता है जिसमें पारण करना अत्यन्त पुण्यकारी माना जाता है। उस शुभ मुहूर्त को पाने के लिए नन्द बाबा ब्राह्म मुहूर्त में ही, अभी अन्धकार रहते हुए, यमुना में स्नान करने चले गए, यह विचार किए बिना कि यह समय जल के देवता वरुण के अनुचरों के लिए वर्जित है।
नन्द बाबा जैसे ही उस गहरे जल में स्नान करने उतरे, वरुण देव के एक सेवक ने उन्हें अनधिकृत समय में जल में प्रवेश करते देखा। उसने नन्द बाबा को पकड़ लिया और वरुण लोक ले गया। जब बहुत देर तक नन्द बाबा जल से बाहर न आए, तो उनके साथी ग्वाल घबरा उठे और 'हे कृष्ण! हे राम!' पुकारते हुए सहायता के लिए दौड़े। उन्होंने आकर सारा वृत्तान्त श्रीकृष्ण और बलराम को सुनाया।
अपने पिता के हरण की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने तनिक भी विचलित हुए बिना, सहज मुस्कान के साथ, स्वयं यमुना के जल में प्रवेश किया और वरुण लोक की ओर चल पड़े। जैसे ही समुद्र और जल के अधिपति वरुण देव को यह ज्ञात हुआ कि साक्षात भगवान श्रीकृष्ण उनके लोक में पधारे हैं, वे अत्यन्त प्रसन्न एवं आदरपूर्वक उठकर उनके स्वागत के लिए आगे आए।
वरुण देव ने श्रीकृष्ण का विधिवत पूजन किया और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहा — 'हे प्रभो! आज मेरा जीवन और मेरा यह लोक धन्य हो गया, जो आपने यहाँ पधारकर मुझे दर्शन दिए। मेरे अज्ञानी सेवक ने अनजाने में आपके पूज्य पिता नन्द जी को यहाँ ले आया। यह उसका अपराध है, कृपया इसे क्षमा करें। आप जैसे परम पिता को पाकर नन्द जी परम भाग्यशाली हैं।' यह कहकर वरुण देव ने नन्द बाबा को ससम्मान श्रीकृष्ण को सौंप दिया।
श्रीकृष्ण अपने पिता को साथ लेकर सकुशल ब्रज लौट आए। नन्द बाबा को इस बीच जो अलौकिक ऐश्वर्य वरुण लोक में दिखाई दिया था, उससे उनका हृदय आश्चर्य और भक्ति से भर उठा। उन्होंने अपने पुत्र कृष्ण की महिमा का प्रत्यक्ष अनुभव किया। ब्रज लौटकर उन्होंने सारा वृत्तान्त अन्य गोपों को सुनाया, जिसे सुनकर सभी विस्मित रह गए।
अब गोपजनों के मन में एक जिज्ञासा उठी — क्या यह बालक कृष्ण सचमुच वही परब्रह्म परमात्मा है, जिसकी वेद स्तुति करते हैं? उनके इस भाव को जानकर करुणामय श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय ब्रजवासियों को क्षणभर के लिए अपने दिव्य धाम — ब्रह्म-सरोवर से परे अपने सच्चिदानन्द स्वरूप — का दर्शन कराया, जिससे उनका सन्देह मिट गया और वे कृतार्थ हो गए।
इस लीला की महिमा यही है कि भगवान अपने भक्त पर आई विपत्ति को स्वयं उपस्थित होकर हर लेते हैं, और उनके निमित्त से देवता भी धन्य हो जाते हैं — जिसके पुत्र या स्वामी स्वयं परमात्मा हों, उसे कोई लोक बाँध नहीं सकता।