
मार्कण्डेय और मृत्युंजय
Markandeya and Mrityunjaya
प्राचीन काल में मृकण्डु नामक एक महान ऋषि थे। उनकी पत्नी का नाम मरुद्वती था। दोनों तपस्वी और धर्मपरायण थे, जो वन में सादा जीवन व्यतीत करते थे। परन्तु उनके जीवन में एक ही अभाव था कि वे निःसंतान थे। वर्षों तक प्रतीक्षा करने के बाद उन्होंने भगवान शिव की आराधना करने का निश्चय किया।
मृकण्डु ऋषि और मरुद्वती ने वर्षों तक अत्यंत कठोर तप किया। अंततः भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। मृकण्डु ऋषि ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। शिव जी ने कहा कि वे उन्हें पुत्र दे सकते हैं, परन्तु उन्हें एक चुनाव करना होगा। या तो वे एक ऐसा पुत्र प्राप्त करें जो सौ वर्ष जिए परन्तु मंदबुद्धि और अयोग्य हो, या फिर एक ऐसा पुत्र जो परम बुद्धिमान और गुणवान हो, परन्तु उसकी आयु केवल सोलह वर्ष हो।
मृकण्डु ऋषि ने विचार किया और शिव जी से कहा कि उन्हें गुणवान पुत्र ही चाहिए, चाहे उसकी आयु सोलह वर्ष ही क्यों न हो। शिव जी ने 'तथास्तु' कहा। समय आने पर एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम मार्कण्डेय रखा गया। वह बालक असाधारण था और बहुत छोटी आयु में ही समस्त शास्त्रों में निपुण हो गया। उसका मन सदा शिव में रमा रहता था।
जैसे-जैसे वर्ष बीतते गए, माता-पिता की चिंता बढ़ती गई। पंद्रहवाँ वर्ष आते-आते वे बालक को देखकर दुःखी होने लगे। मार्कण्डेय के पूछने पर उन्होंने उसे सारा वृत्तांत सुना दिया। यह सुनकर मार्कण्डेय के मुख पर भय नहीं आया। उन्होंने शांत भाव से कहा कि जिन महादेव ने उन्हें यह आयु दी है, वही मृत्यु के भी स्वामी हैं। उन्होंने शेष समय शिव आराधना में लगाने का निर्णय लिया।
मार्कण्डेय शिवालय में चले गए और वहाँ शिवलिंग की स्थापना कर अखंड आराधना आरंभ कर दी। वे दिन-रात महामृत्युंजय मंत्र का जप करने लगे। अंततः वह दिन आ गया, जब मार्कण्डेय के सोलहवें वर्ष का अंतिम क्षण था। यमराज स्वयं अपने महिष पर सवार होकर आए और बालक से चलने को कहा। मार्कण्डेय ने विनम्रता से मना कर दिया और शिवलिंग को अपनी भुजाओं में कसकर लपेट लिया।
यमराज ने अपना कालपाश फेंका, जो बालक के साथ-साथ शिवलिंग पर भी पड़ गया। उसी क्षण शिवलिंग फट गया और उसमें से महाकाल के रूप में स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने यमराज को अपनी सीमा याद दिलाई और उन पर प्रहार किया। यमराज के निष्क्रिय होते ही सृष्टि का चक्र रुक गया। तब समस्त देवताओं ने शिव जी से प्रार्थना की कि वे यमराज को जीवनदान दें, क्योंकि उनके बिना सृष्टि का क्रम समाप्त हो जाएगा। शिव जी ने यमराज को पुनर्जीवित किया और मार्कण्डेय को चिरंजीवी होने का वरदान दिया।