
केसरी और शंबसादन असुर की कथा
Kesari Aur Shambasadan Asur Ki Katha
हनुमान जी के पिता वानरराज केसरी अत्यंत बलशाली, वीर और धर्मपरायण थे। वे न केवल एक कुशल शासक थे, अपितु सज्जनों और ऋषि-मुनियों के रक्षक भी थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी और निर्भय थी, और वन में तपस्या करने वाले साधु-संत भी उनके संरक्षण में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करते थे। केसरी का नाम ही वीरता और धर्म का पर्याय बन गया था।
उन्हीं दिनों उस क्षेत्र में शंबसादन नामक एक भयंकर असुर का उत्पात बढ़ गया था। यह असुर अत्यंत बलशाली, मायावी और क्रूर स्वभाव का था। वह वन में तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों को सताता, उनके यज्ञ-अनुष्ठानों को नष्ट कर देता और निरीह प्राणियों पर अत्याचार करता। उसके आतंक से पूरे वन में भय और त्राहि-त्राहि छा गई थी। ऋषि-मुनि अपनी साधना छोड़कर इधर-उधर भटकने लगे और सज्जन प्रजा भयभीत रहने लगी।
जब यह असुर अपने अत्याचारों की सीमा पार करने लगा, तब पीड़ित ऋषि-मुनि और वनवासी सहायता की आशा में वानरराज केसरी की शरण में पहुँचे। उन्होंने केसरी के समक्ष अपनी व्यथा कही और उस दुष्ट असुर के अत्याचारों का वर्णन किया। केसरी का धर्मनिष्ठ हृदय यह सुनकर करुणा और वीरता से भर उठा। उन्होंने संतों को अभय-वचन देते हुए कहा कि वे उस असुर का अंत कर उन्हें भय से मुक्त करेंगे।
अपने वचन के अनुसार वानरराज केसरी उस शंबसादन असुर से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। दोनों के बीच घोर संग्राम हुआ। असुर अपनी माया और बल से केसरी को पराजित करने का प्रयास करता रहा, किंतु धर्म की शक्ति और अपने अपार बल से केसरी अडिग बने रहे। लंबे और भीषण युद्ध के पश्चात केसरी ने उस दुष्ट असुर का वध कर डाला और वन को उसके आतंक से मुक्त कर दिया।
केसरी की इस वीरता से समस्त ऋषि-मुनि और वनवासी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने केसरी को हृदय से आशीर्वाद दिया और उनकी धर्मनिष्ठा तथा पराक्रम की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। इस विजय से केसरी की कीर्ति और भी अधिक फैल गई, और वे धर्म के रक्षक के रूप में सदा के लिए विख्यात हो गए। कहा जाता है कि इसी वीरता के कारण उन्हें "केसरी" अर्थात सिंह के समान पराक्रमी की उपाधि सार्थक रूप से प्राप्त हुई।
ऐसे धर्मनिष्ठ और वीर पिता की संतान होना हनुमान जी के लिए गौरव का विषय था। पिता का पराक्रम, धर्मपरायणता और संतों की रक्षा का संस्कार हनुमान जी में जन्म से ही समाहित था, जो आगे चलकर उनके जीवन में और भी दिव्य रूप में प्रकट हुआ।
केसरी और शंबसादन की यह कथा हमें यह भाव देती है कि सच्चा वीर वही है जो अपने बल का प्रयोग निर्बलों की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए करे — और यही संस्कार हनुमान जी को अपने पिता से विरासत में मिला।