
कार्तिकेय जन्म और तारकासुर वध
Kartikeya Janm Aur Tarakasur Vadh
१. तारकासुर का तप
वज्रांग नामक दैत्य और उनकी पत्नी वारंगी के पुत्र थे तारकासुर।
बाल्यकाल से ही वह अत्यंत महत्वाकांक्षी था। बड़ा होकर वह वन में गया और ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या आरंभ की।
उसका तप इतना कठोर था कि तीनों लोक तपने लगे। अंततः ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले — "वर माँगो।"
तारकासुर ने कहा — "मुझे अमरता दीजिए।"
ब्रह्मा जी बोले — "यह असंभव है। जिसने जन्म लिया, उसकी मृत्यु निश्चित है। कोई और वर माँगो।"
२. चतुर वर
तब तारकासुर ने बहुत सोच-विचारकर एक ऐसा वर माँगा, जो उसकी दृष्टि में अमरता के ही समान था —
"मेरी मृत्यु केवल भगवान शिव के औरस पुत्र के हाथों हो — और वह भी तब, जब वह मात्र सात दिन का शिशु हो।"
उसका गणित यह था —
सती जा चुकी हैं। शिव जी उनके वियोग में समाधि में लीन हैं। वे न विवाह करेंगे, न कोई संतान होगी। और यदि किसी असंभव स्थिति में पुत्र हुआ भी, तो सात दिन का शिशु मुझ जैसे महाबली को क्या मार सकेगा?
ब्रह्मा जी ने "तथास्तु" कह दिया।
३. तीनों लोकों पर आतंक
वर पाते ही तारकासुर उन्मत्त हो गया।
उसने स्वर्ग पर आक्रमण किया और इन्द्र को सिंहासन से उतार दिया। देवताओं को बंदी बनाकर उनसे दास-कर्म कराया।
सूर्य को उसने मंद तेज से चलने का आदेश दिया, चंद्रमा को सदा पूर्ण रहने को कहा, वायु को उसकी इच्छानुसार बहने पर विवश किया।
ऋषियों के यज्ञ नष्ट कर दिए गए, तीर्थ अपवित्र कर दिए गए। धर्म का समस्त क्रम रुक गया।
देवता ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने कहा —
"मैं अपना ही दिया वर नहीं तोड़ सकता। उपाय एक ही है — शिव जी का विवाह हो और उनका पुत्र जन्म ले। अन्यथा कोई मार्ग नहीं।"
४. शिव-विवाह
यहीं से वह लंबी शृंखला आरंभ हुई —
सती ने हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। देवताओं ने कामदेव को भेजा, जो शिव जी के तृतीय नेत्र से भस्म हो गए। फिर पार्वती जी ने वर्षों की घोर तपस्या की, समस्त परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं, और अंततः शिव-पार्वती विवाह संपन्न हुआ।
अब देवताओं की प्रतीक्षा आरंभ हुई — शिव-पुत्र कब जन्म लेंगे?
५. देवताओं की अधीरता
परन्तु शिव और पार्वती दीर्घकाल तक एकांत में रहे। युग बीतते गए, पर कोई संतान नहीं हुई।
उधर तारकासुर का अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था। देवता अधीर हो उठे और उन्होंने अग्निदेव को भेजा कि वे किसी प्रकार शिव जी तक यह आग्रह पहुँचाएँ।
६. शिव तेज और अग्नि
अग्निदेव कैलाश पहुँचे। शिव जी ने उनकी स्थिति समझी और अपना तेज प्रकट किया।
परन्तु वह तेज इतना प्रचंड था कि अग्निदेव — जो स्वयं अग्नि हैं — उसे धारण नहीं कर सके। वे जलने लगे।
शिव जी ने कहा — "इसे धारण करना सामान्य सामर्थ्य का कार्य नहीं। जाओ, इसे किसी उपयुक्त स्थान पर रखो।"
अग्निदेव उस तेज को गंगा में ले गए। गंगा जी भी उसका ताप सह न सकीं और उसे हिमालय की तलहटी में शरवण नामक सरकंडों के वन में छोड़ दिया।
(पाठभेद — कुछ ग्रंथों में यह क्रम भिन्न है; कहीं तेज सीधे गंगा में जाता है, कहीं पार्वती जी की भूमिका अधिक विस्तार से आती है।)
७. जन्म — छह मुख वाला बालक
उस सरकंडों के वन में वह तेज छह भागों में विभक्त होकर छह अत्यंत तेजस्वी शिशुओं के रूप में प्रकट हुआ।
उसी समय आकाश में विचरण करती छह कृत्तिकाएँ (आकाश में कृत्तिका नक्षत्र की छह तारिकाएँ) वहाँ से निकलीं। उन्होंने उन शिशुओं को देखा और मातृ-वात्सल्य से भर उठीं। प्रत्येक ने एक-एक शिशु को गोद में लेकर स्तनपान कराया।
तभी माता पार्वती वहाँ पहुँचीं। पुत्र-स्नेह में उन्होंने छहों शिशुओं को एक साथ अपने हृदय से लगा लिया —
और उसी क्षण छहों शरीर एक हो गए, परन्तु छह मुख बने रहे।
इस प्रकार वह अद्भुत बालक प्रकट हुआ — एक देह, छह मुख, बारह भुजाएँ।
८. नामों का अर्थ
इस बालक के अनेक नाम पड़े, और हर नाम के पीछे एक कारण है —
कार्तिकेय — छह कृत्तिकाओं द्वारा पालित होने से।
षडानन / षण्मुख — छह मुख होने से।
स्कंद — शिव तेज के स्कंदन (प्रवाह) से उत्पन्न होने के कारण।
शरवणभव — शरवण (सरकंडों के वन) में जन्म लेने से।
गुह — गुप्त रूप से जन्म लेने के कारण।
सुब्रह्मण्य — ब्रह्मज्ञान के स्वामी होने से (यह नाम दक्षिण भारत में सर्वाधिक प्रचलित है)।
मुरुगन — तमिल में, अर्थात् "सुंदर, चिर-युवा"।
कुमार — सदा युवा रहने के कारण।
महासेन / देवसेनापति — देवताओं की सेना के सेनापति होने से।
९. सेनापति पद
बालक अत्यंत शीघ्र गति से बढ़ा। जन्म के कुछ ही दिनों में उन्होंने वह बल और ओज प्राप्त कर लिया जो युगों की साधना से भी दुर्लभ है।
ब्रह्मा जी ने उन्हें वेदों का ज्ञान दिया। शिव जी ने उन्हें युद्ध-विद्या सिखाई और अपना दिव्य अस्त्र दिया।
माता पार्वती ने उन्हें वह अस्त्र प्रदान किया जो उनकी पहचान बन गया — वेल (शक्ति भाला)। यह अस्त्र वस्तुतः शक्ति का ही स्वरूप है, और दक्षिण भारत में इसकी पूजा होती है।
तत्पश्चात् छठे दिन समस्त देवताओं ने उनका अभिषेक कर उन्हें देवसेनापति के पद पर प्रतिष्ठित किया।
उनका वाहन बना मयूर (मोर), और ध्वजा पर कुक्कुट (मुर्गा) अंकित हुआ।
१०. युद्ध की घोषणा
देवसेना लेकर कार्तिकेय तारकासुर की ओर बढ़े।
तारकासुर को जब यह समाचार मिला कि उससे युद्ध करने एक छह दिन का शिशु आ रहा है, तो वह ठहाका मारकर हँसा।
"मैंने ब्रह्मा जी से जो वर माँगा था, वह मेरी बुद्धि की विजय थी। और अब देवता एक दूधमुँहे बालक को मेरे सामने भेज रहे हैं? यह मेरा उपहास है।"
परन्तु जब वह रणभूमि में आया और उसने कार्तिकेय का तेज देखा, तो एक क्षण के लिए वह स्तब्ध रह गया। वह बालक सूर्य के समान दीप्त था और उसकी आँखों में कोई भय नहीं था।
११. महायुद्ध
घोर संग्राम आरंभ हुआ।
पहले तारकासुर के सेनापति क्रौंच, बाणासुर और अन्य दैत्य सेनापति आगे आए। कार्तिकेय ने एक-एक करके सबको परास्त किया।
फिर तारकासुर स्वयं आया। उसने अपनी समस्त माया का प्रयोग किया — कभी पर्वत बरसाए, कभी अंधकार फैलाया, कभी सहस्रों रूप धारण किए।
कार्तिकेय अविचल रहे। उन्होंने प्रत्येक माया का नाश किया।
१२. वध
अंततः वह क्षण आया।
कार्तिकेय ने अपनी माता द्वारा दिया गया वेल उठाया — वह अस्त्र जो स्वयं आदिशक्ति का तेज था।
उन्होंने पूरे बल से उसे तारकासुर के वक्ष पर प्रहार किया।
वेल ने उसका हृदय भेद दिया। महाबली तारकासुर, जिसने तीनों लोकों को कँपा रखा था, उसी दिन धराशायी हो गया — जन्म के सातवें दिन, ठीक जैसा वर था।
कहा जाता है कि मरते समय तारकासुर के मुख पर क्रोध नहीं, शांति थी। उसने कार्तिकेय के तेज में शिव का दर्शन कर लिया था, और उसे मुक्ति मिल गई।
१३. विजय के बाद
देवता मुक्त हुए। इन्द्र को स्वर्ग का सिंहासन वापस मिला। यज्ञ पुनः आरंभ हुए, ऋतुएँ अपने क्रम में लौट आईं।
इन्द्र ने कृतज्ञतावश अपनी पुत्री देवसेना का विवाह कार्तिकेय से किया।
दक्षिण भारत की परंपरा में उनकी दूसरी पत्नी वल्ली मानी जाती हैं, जो एक वनवासी कन्या थीं। यह प्रसंग तमिल परंपरा में अत्यंत प्रिय है — देवसेना दैवीय प्रेम का