
कर्ण को सत्य बताना और अंतिम प्रस्ताव
Karn ko Satya Bataana aur Antim Prastaav
शांति के अंतिम प्रयास विफल होने के पश्चात, जब भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से लौट रहे थे, तब उन्होंने महारथी कर्ण को अपने रथ पर बैठा लिया। भगवान जानते थे कि कर्ण वास्तव में कुंती का ज्येष्ठ पुत्र है, जो कुँआरी अवस्था में सूर्यदेव के आशीर्वाद से जन्मा था, और जिसे कुंती ने लोकलाज के भय से नदी में प्रवाहित कर दिया था। इसी कारण कर्ण को सूतपुत्र समझा जाता रहा और वह जीवन भर उपेक्षा सहता रहा।
एकांत में भगवान ने कर्ण को यह गहन रहस्य बताया — "हे कर्ण, तुम सूतपुत्र नहीं हो। तुम कुंती के ज्येष्ठ पुत्र और पांडवों के बड़े भाई हो। धर्मराज युधिष्ठिर तुमसे छोटे हैं। तुम्हारी रगों में कुरुवंश और सूर्य का दिव्य रक्त बहता है।" यह सत्य जानकर कर्ण एक क्षण के लिए स्तब्ध रह गया, किंतु उसका मन विचलित नहीं हुआ।
भगवान ने कर्ण के समक्ष एक अद्भुत प्रस्ताव रखा — "यदि तुम पांडवों के पक्ष में आ जाओ, तो तुम्हीं ज्येष्ठ होने के कारण राजा बनोगे। पाँचों पांडव तुम्हारे अनुज होकर तुम्हारी सेवा करेंगे और द्रौपदी सहित समस्त राजवैभव तुम्हारे चरणों में होगा। तुम इस अधर्मी दुर्योधन का साथ छोड़कर धर्म के पक्ष में आ जाओ।" यह प्रस्ताव किसी भी वीर के लिए अत्यंत लोभनीय था।
किंतु दानवीर और सत्यनिष्ठ कर्ण ने विनम्रता से यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। उसने कहा — "हे माधव, यह सत्य जानकर भी मैं दुर्योधन को धोखा नहीं दे सकता। जब सारे संसार ने मुझे सूतपुत्र कहकर तिरस्कृत किया, तब दुर्योधन ने ही मुझे अंगदेश का राजा बनाकर सम्मान और मित्रता दी। उसी के बल पर वह युद्ध का साहस कर रहा है। ऐसे समय में उसे छोड़ देना कृतघ्नता होगी, जो मैं प्राणों की बलि देकर भी नहीं करूँगा।"
कर्ण ने आगे कहा — "हे केशव, मैं जानता हूँ कि जहाँ धर्म और आप हैं, वहीं विजय है। यह युद्ध में मेरा वध निश्चित है, फिर भी मैं मित्रधर्म का पालन करते हुए ही प्राण त्यागना चाहता हूँ। बस, मेरी एक प्रार्थना है कि यह रहस्य युद्ध समाप्त होने तक गुप्त ही रखा जाए।" कर्ण के इस त्याग, स्वामीभक्ति और सत्यनिष्ठा को देखकर भगवान श्रीकृष्ण भी अत्यंत प्रसन्न और गद्गद हो उठे।
इस लीला का भाव यही है कि भगवान अपने भक्तों और वीरों के गुणों को भली-भाँति पहचानते हैं और उनका सम्मान करते हैं। कर्ण भले ही अधर्म के पक्ष में रहा, किंतु उसकी दानवीरता, कृतज्ञता और वचन-निष्ठा युगों-युगों तक स्मरणीय है। यह कथा सिखाती है कि सच्चा मनुष्य लोभ में पड़कर अपने कर्तव्य और मित्रधर्म का त्याग नहीं करता।